बांकेगंज। घर के आंगन में फुदकती, चहकती गौरैया बरामदे में बैठकर चावल बीनती मां की थाली से कुछ दाने चुराकर उनके ही पहलू में छिप जाना, झरोखों से झांकती एवं चीं-चीं करती गौरैया और आंगन में फुदकती गौरैया के पीछे-पीछे नन्हे कदमों से भागते बच्चे, ये खूबसूरत नजारे अब दिखाई नहीं देते। बचपन की ये मीठी यादें भर बाकी हैं। घर-आंगन की यह रंगीन परी मानो अब रूठ गई है।
गांव-घर की खुशियां बढ़ाने वाली गौरैया धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। इसके पीछे इनके प्राकृतवास में आ रही कमी है। गौरैया प्राय: घरों के ताकों, झरोखों में अपने घोंसला बनाती थीं, लेकिन अब गांव और शहरों के घरों की बनावट कुछ ऐसी हो गई है कि कि उनमें गौरैया के लिए कहीं जगह ही नहीं बची है। घरों के आसपास पेड़ों के कटने से गौरैया का घरौंदा ही छिन गया है।
मोबाइल टॉवरों का रेडिएशन भी गौरैया के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। खेतों में कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल भी इनकी आबादी घटने का प्रमुख कारण है। प्राकृतवास और भोजन की कमी के कारण यह नन्हीं परी घर के आंगन से रूठी तो मनो खुशियां भी घर से रूठ गईं।
गौरैया के तेजी से लुप्त होने से चिंतित दुनिया भर के लोगों ने गौरैया फिर से आंगन में लौटे इसके लिए प्रयास शुरू किए और वर्ष 2010 में 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस घोषित कर दिया। गौरैया के संरक्षण और संवर्धन के प्रयास शुरू किए, लेकिन जिले में पिछले 40 सालों में गौरैया की संख्या घटकर महज 20 फीसदी रह गई। पिछले तीन-चार वर्षों में पक्षी प्रेमियों ने गौरैया बचाने की जो मुहिम शुरू की, उसके तहत कृत्रिम घोंसले बनाकर लोगों को बांटे गए। इससे कुछ हद तक गौरैया की वापसी शुरू हुई है। इसके लिए जन जागरूकता अभियान भी चलाया जा रहा है।
गौरैया का न केवल प्रकृति में विशेष महत्व है, बल्कि यह घर-आंगन की खुशी भी कही जाती है। बदलते परिवेश और वातावरण में गौरैयों की संख्या लगातार घट रही है। वन विभाग के साथ ही तमाम समाज सेवी संस्थाएं और पक्षी प्रेमी भी गौरैया बचाने की मुहिम से जुड़ रहे हैं।
- डॉ. अनिल कुमार पटेल, उपनिदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्व, बफरजोन