ईसानगर। यहां के दशहरा मेले का इतिहास दो सौ साल पुराना है। जागड़ा के राजा रंजीत सिंह द्वारा शुरू किया गया मेला अब भी जारी है। इस रामलीला को देखने के लिए क्षेत्र के करीब सौ से अधिक गांवों के हजारों लोग आते हैं। ईसानगर का दशहरा मेला अति प्राचीन होने के कारण काफी विख्यात है।
ईसानगर मे ऐतिहासिक दशहरे मेले का आयोजन 200 साल से किया जा रहा है। गांव के बुजुर्ग बांके लाल शुक्ला बताते है कि ब्रिटिश हुकूमत के समय जागड़ा राजा रंजीत सिंह ने इस मेले की शुरूआत कराई थी। वे कहते हैं कि तब धर्म और अध्यात्म के प्रचार-प्रसार का कोई और तरीका नहीं था। इसलिए दशहरा के दिन होने वाली रामलीला के जरिए जहां धर्म का प्रचार होता था, वहीं लोगों का आपस में मेलजोल भी होता था। साथ ही यह मनोरंजन और रोजगार का साधन भी था। ईसानगर के ही निवासी जगदीश शुक्ला ने बताया कि प्राचीन रामलीला में हिन्दू धर्म की परंपराओं का भी ध्यान रखा जाता है। यह रामलीला पूर्ण रूप से रामचरित मानस पर आधारित है। इसमें कच्चे बांस से दशानन की प्रतीकात्मक पुतला बनाया जाता है। ब्रिटिश शासन काल मे पुतला दहन नही किया जाता था हाथियों से रावण के पुतले को कुचलकर मारने की परंपरा थी। रावण वध के दौरान पंचक का भी ध्यान रखा जाता है। रविवार व मंगलवार को रावण बध नही किया जाता है।
करीब 200 साल पहले ईसानगर स्टेट के जागड़ा राजा रंजीत सिंह ने रामलीला का आयोजन किया था। तब से लेकर अब तक उन्हीं के वंशज ही रामलीला के अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। कमेटी अध्यक्ष राजा राजेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि हमारे पूर्वजों द्वारा इस मेले का आयोजन करवाया गया था। नौ दिनों तक चलने वाले इस मेले का समापन दशमी को रावण वध व शस्त्र पूजन के साथ होता है।