- क्रांतिकारियों में लोकप्रिय हुई उनकी लिखी प्रभातफेरी
- जेल और यातनाएं भी नहीं रोक सकीं उनकी लेखनी
स्वाधीनता आंदोलन में खीरी जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने-अपने ढंग से योगदान किया। राजनारायन मिश्र, नसीरुद्दीन मौजी जैसे लोगों ने सशस्त्र क्रांति का रास्ता अपनाया तो अधिकांश ने गांधी जी के शांति और अहिंसा के रास्ते पर चलकर आजादी की लड़ाई लड़ी। लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति के लिए प्रेरित करना और क्रांतिकारियों में जोश भरना भी एक बड़ा काम था। यह काम मन्यौरा के कवि पंडित बंशीधर शुक्ल ने किया। आम लोगों की भाषा में लिखी उनकी कविताओं ने स्वाधीनता सेनानियों जोश भरने का काम किया।
जिले के मन्यौरा गांव में बसंत पंचमी 1904 को जन्मे पंडित बंशीधर शुक्ल का पूरा जीवन अभावों में बीता। अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए 15 साल की उम्र में ही वह पुस्तक व्यवसाय से जुड़ गए। वह खुद भी कविताएं लिखने लगे। शुरुआती दौर में उन्होंने कुछ श्रृंगारिक कविताएं लिखीं, लेकिन उन दिनों देश की हालात देखकर क्रांति की ओर रुझान बढ़ा और वह देशभक्ति की कविताएं लिखने लगे। पुस्तक व्यवसाय से जुड़े होने के कारण उनका संपर्क क्रांतिकारी गणेश शंकर विद्यार्थी से हुआ। तभी से वह क्रांतिकारी पार्टी के लिए कविताएं लिखने लगे। उनकी रचनाएं काफी लोकप्रिय हुईं।
वर्ष 1921 में पं. बंशीधर शुक्ल पूरी तरह राजनीति में सक्रिय हो गए। सन 1928 में बंश्ीधर शुक्ल महात्मा गांधी के आह्वान पर कांग्रेस में शामिल हो गए। दम-दम कांड के बाद बंशीधर शुक्ल ने एक अत्यंत क्रांतिकारी कविता लिखी। यह लंबी कविता खूनी परचा के नाम से प्रसिद्ध हुई। गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रेरणा से लिखी गई यह कविता पूरे देश में एक ही रात में रिलीज की गई।
वर्ष 1928 में ही लिखी उनकी प्रभातफेरी काफी लोकप्रिय हुई। क्रांतिकारियों में यह रचना रच बस गई ‘उठो सोने वालों सबेरा हुआ है, वतन के फकीरों का फेरा हुआ है’ क्रांतिकारी रचनाओं के कारण वह अंग्रेजी सरकार की आंखों में खटकने लगे। जब धर पकड़ बढ़ी तो वेश बदलकर ज्योतिषी बन गए और दशाश्वमेध घाट पर प्रवचन करने के साथ ही क्रांतिकारी साहित्य भी वितरित करने लगे। उनकी यह कविता भी काफी प्रसिद्ध हुई-
कोई भी जुल्म करे हम पर, हम कष्ट झेलने निकले हैं,
हम कफन बांधकर भारत को आजाद कराने निकले हैं।
बंशीधर शुक्ल का यह गीत तो आज तक लोग गुनगाने हैं-
उठ जाग मुसाफिर भोर भयो, अब रैन कहां जो सोवत है।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सन 1940 में पंडित बंशीधर शुक्ल को तीन साल की सजा सुनाई गई। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान उन्हें कई बाद जेल जाना पड़ा और यातनाएं सहनी पड़ीं। लेकिन इस योद्धा की लेखनी आग उगलती रही। आजादी के बाद भी इनके विद्रोही तेवरों में कोई कमी नहीं आई। आजादी के बाद एक बार विधायक भी बने लेकिन सिस्टम के खिलाफ तब भी आवाज उठाते रहे। अवधी सम्राट और राष्ट्रकवि आदि संबोधनों से नवाजे गए पं. बंशीधर शुक्ल का जितना योगदान साहित्य जगत में है उससे ज्यादा स्वतंत्रता आंदोलन में है।