वसंत पंचमी को उनकी जयंती मनाई जा रही है। हर साल यह कार्यक्रम करने के बाद लोग उन्हें बिसरा देते हैं। यही कारण है कि जिला खीरी ही नहीं पूरे देश में हिंदी साहित्य के इस चमकते सितारे के नाम पर न तो एक मार्ग है न पार्क, न रेलवे स्टेशन और न ही बस स्टेशन, न पत्थर की मूर्ति न कोई स्कूल। पं. बंशीधर शुक्ल की जयंती वसंत पंचमी को उनके पुत्र सत्यधर शुक्ल हर साल पैतृक गांव मन्यौरा में मनाते हैं। कुछ साहित्य प्रेमी उनके जन्मदिन के कार्यक्रम में शामिल होकर गौरवान्वित हो लेते हैं। इसके बाद पूरे साल भूले रहते हैं।
वसंत पंचमी 1904 में जन्मे पं. बंशीधर शुक्ल का रचना संसार प्रखर राष्ट्रवाद की आराधना है। प्रारंभिक दौर में उन्होंने कुछ शृंगारिक रचनाएं लिखीं लेकिन बाद में राष्ट्रीय जनजागरण की कविताएं लिखने लगे। 15 वर्ष की आयु में पिता छेदीलाल शुक्ल के निधन के बाद जीविकोपार्जन के लिए वह पुस्तक व्यवसाय से जुड़े। इसी दौरान उनका संपर्क गणेश शंकर विद्यार्थी से हुआ और वह स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और अनेक राष्ट्रीय रचनाएं लिखीं।
पं. बंशीधर शुक्ल के अवधी भाषा कृतित्व का गवेषात्मक अनुशीलन विषय पर शोध करने वाले डॉ. अनिल त्रिपाठी का कहना है कि पं. बंशीधर शुक्ल की काव्यधारा में एक वह दौर आया जब वह जनजागरण के अग्रदूत बन गए। वर्ष 1928 में उनका लिखी रचना-
उठो सोने वालों सवेरा हुआ है, वतन के फकीरों का फेरा हुआ है।
और 1929 में लिखा गीत-
उठ जाग मुसाफिर भोर भयो, अब रैन कहां जो सोवत है।
जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है।
हर गांव, शहर में स्वधीनता सेनानी प्रभातफेरी के दौरान गाया करते थे। उनकी कालजयी रचना खूनी पर्चा काफी चर्चित हुई जो पूरे देश में एक साथ रिलीज की गई।
डॉ. अनिल त्रिपाठी का कहना है कि पं. बंशीधर शुक्ल की रचनाओं मेें गांवों और किसानों की दशा का सजीव चित्रण है। किसानों की दशा का उन्होंने जो चित्रण किया आज भी छोटे किसानों की हालत उससे जुदा नहीं है। किसान की दशा उनके शब्दों में देखिए-
दुपहरिया में चार पनेथी, बड़की लुटिया पानी,
कबौ चबेना मट्ठा सरबत, ऐसे ही गै जिंदगानी।
पेड़ा गट्टा मेले ठेले, बेढ़ई बरा फुलौरी,
तिथि परबिया भए बियाहे पुवा कचौरी।
चना मिठाई बहुरा, भुरकी तिलधौरी गुड़धनिया,
सबै रितुन का यहै कलेवा, यह किसान की दुनिया।
किसानों के शोषण पर भी पं. बंशीधर शुक्ल की कलम खूब चली-
पटवारी खुरधाल चलावै बेदखली इस्तीफा,
रोजइ कुड़की और जुरमाना, छिन छिन नवा लतीफा।
थाना चौकी, पुलिस कचेहरी, इसंपेट्टर और पासी,
सब अपनी ससुरारि बनाएं अफसर और चपरासी।
अवधी भाषा के कवियों में गोस्वामी तुलसी दास के बाद पं. बंशीधर शुक्ल ही अवधी के ऐसे कवि हुए जिनका साहित्य देश विदेश में शोध का विषय बना। उनका प्रकृति और मौसम का चित्रण बेहद सजीव है। ऐसे कवि को उनके ही जिले में भुला दिया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
आज भी उपेक्षित है उनका पैतृक गांव मन्यौरा
पं. बशीधर शुक्ल 1950 में विधायक भी बने लेकिन उनका गांव आज तक उपेक्षित है। उनकी रचना स्थली मन्यौरा गांव में सड़कों के नाम पर कुछ खड़ंजा जरूर लगा है। नालियां न होने से जगह-जगह जलभराव है। जगह-जगह लगे कूड़े के ढेर गांव की दशा बयां कर रहे हैं। हालत तो यह है कि गांव में चल रहे स्कूल के बच्चे और शिक्षक तक बंशीधर शुक्ल के बारे में नहीं जानते। प्रधान मंजीत कुमार बंशीधर शुक्ल की जन्म और कर्मस्थली की उपेक्षा से दुखी हैं।