होली पर किसी को रंगकर हर कोई आनंदित होना चाहता है, पर आपने कभी यह सोचा है कि रंगों के इस पर्व को नेत्रहीन कैसे मनाते हैं? ऐसा नहीं है कि वे होली के महत्व अथवा रंगों के नाम से वाकिफ न हों, फर्क इतना है कि वे सिर्फ रंगों के नाम जानते हैं। इसके बाद भी होली के हुड़दंग को लेकर साधारण लोगों से उनकी इच्छाएं कम नहीं हैं।
पिंकू को भाता है काला रंग
बांकेगंज के गांव मैकूपुर निवासी 20 साल के पिंकू का कहना है कि हरे, नीले, पीले, लाल, गुलाबी, काले आदि कई रंग होते हैं पर अंतर वह चाह कर भी नहीं बता सकता। वजह, उसकी दुनिया में सिर्फ एक ही रंग है वह है काला, पर होली खेलने की तमन्ना उसमें किसी से कम नहीं है। वह हर साल जमकर होली खेलता है।
आवाज सुनकर रंग डालती हैं बबली
गोला के गांव अहमदनगर निवासी किसान सुरेश मिश्र की 19 वर्षीय पुत्री बबली मिश्रा की दुनिया भले ही रंगहीन हो पर होली के दिन वह भी सभी को रंग से सराबोर कर देना चाहती हैं। कौन सा रंग उसे अधिक पसंद है? के जवाब में बबली का उत्तर था कोई भी। वजह रंगों का उसकी जिंदगी में कोई महत्व नहीं है, इसलिए उसने अपने पिता से सिर्फ रंग लाने को कहा है। चाहे वह कोई रंग हो।
जिले में पिंकू, बबली जैसे तमाम हैं नेत्रहीन
होली का आनंद उठाने में हालांकि सभी आयु वर्ग के लोग पीछे नहीं रहते पर सबसे अधिक खुशी बच्चों को होती है। शिक्षा विभाग के रिसोर्स सेंटर में तमाम नेत्रहीन बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। होली अवकाश के कारण उनसे बात तो नहीं हो सकी, लेकिन बीएसए डॉ. ओपी राय कहते हैं कि होली पर छुट्टी पर जाते समय बच्चों में खासा उत्साह था।