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निघासन कांड : 14 गवाह और 40 सबूतों ने साफ किया इंसाफ का रास्ता

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लखीमपुर खीरी। निघासन कांड मामले में बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेश सिंह मुन्ना ने काफी मशक्कत करते हुए पूरे मामले में दुष्कर्मी किशोर को बचाने के लिए हर संभव जतन किये, वहीं अभियोजन की ओर से पेश 14 गवाह व टीसी फर्द बरामदगी और एफएसएल रिपोर्ट सहित 24 प्रपत्र नाबालिग दुष्कर्मी को उसके अंजाम तक पहुंचाने में मददगार साबित हुए।
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एडीजीसी संजय सिंह ने बताया कि इतने के बाद भी दिक्कतें संभावित थीं, लिहाजा अदालत में मौके से बरामद वस्तुओं जैसे हेयर बैंड, प्लास्टिक चूड़ी, माला, मोती छल्ला और टाप्स आदि कुल 40 वस्तुओं को भी अदालत में पेश किया था, जिसके आधार पर अदालत कड़ियां जोड़ते हुए पूरे घटनाक्रम को स्पष्ट कर सकी।


पुलिस ने की दुष्कर्मी की मदद
निघासन। अदालती पत्रावली कहती है कि बचाव पक्ष की ओर से दुष्कर्मी किशोर की जन्म तिथि के बारे में कोई पक्के सबूत नही थे, लिहाजा हर तरफ से थक जाने के बाद बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेश सिंह मुन्ना ने दुष्कर्मी किशोर को नाबालिग घोषित कराने के लिए उसका मेडिकल कराने और आयु तय कराने के लिए अर्जी दाखिल की थी। इस पर खुद कोतवाली प्रभारी ने उनका काम आसान कर दिया। दौड़धूप करने के बाद दुष्कर्मी किशोर की टीसी खोज लाए और अदालत में दाखिल कर दी। यह देखना जरूरी नहीं समझा कि जो टीसी वह दे रहे हैं, उससे दुष्कर्मी की मदद होगी। हुआ भी ऐसा ही। जैसे ही पुलिस की ओर से पांचवें किशोर दुष्कर्मी की टीसी दाखिल हुई। बचाव पक्ष ने कहा कि वह मेडिकल कराने वाली अर्जी न सिर्फ वापस लेते हैं, बल्कि पुलिस के कागज पर यकीन करते हैं। इस टीसी को सबूत के रूप में लिया जाए। इससे साबित होता है कि आरोपी नाबालिग है। लिहाजा उसे अपचारी किशोर घोषित किया जाए।
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18 अक्तूबर को घोषित हुआ था अपचारी किशोर
निघासन कांड के मामले में पांचवें आरोपी के रूप में जिस दुष्कर्मी किशोर को दंडित किया गया है, उसे पुलिस ने अपनी चार्जशीट में बालिग अपराधी माना था और उसे बालिग मानते हुए ही उसकी 20 साल की आयु बताकर आरोपपत्र दिया था, लेकिन 29 सितंबर को दाखिल हुए आरोपपत्र पर जब सुनवाई शुरू हुई तो 18 अक्तूबर 2022 को पांचवें अपराधी को अदालत ने किशोर माना। उसकी आयु 18 साल से कम लेकिन 16 साल से अधिक थी, लिहाजा उसकी सुनवाई अपनी अदालत में ही की। छठे अपराधी की आयु 16 वर्ष से भी कम होने के कारण उसकी पत्रावली बाल अपचारी के रूप में किशोर न्याय बोर्ड सलेमपुर कोन भेज दी गई है।

कानूनी विरोधाभास ने बढ़ाईं दिक्कतें
अपचारी किशोर को सजा देने के मामले में काफी दिक्कतें आईं। अपने 107 पेज के फैसले में अदालत को पूरे आठ पेज सजा के बिंदु पर सुनवाई के बाद खर्च करने पड़े हैं। इस मामले में जहां नाबालिग बच्चियों के साथ दुष्कर्म और हत्या कर देने के मामले में पॉक्सो एक्ट की धाराओं में फांसी की सजा को अधिकतम माना गया है, तो किसी भी कीमत पर उम्रकैद से कम की सजा का प्रावधान नहीं रती है। वहीं आरोपी के किशोर होने के कारण किशोर न्याय अधिनियम ने उसे ऐसी उम्रकैद देने से मना किया है, जिसमें उसके छूटने की संभावना न हो। परस्पर विरोधाभास और स्थितियों पर चिंतन के बाद अदालत ने अपने फैसले में रिहाई की संभावनाओं सहित उम्रकैद के विकल्प को श्रेष्ठ माना है।


अमर उजाला में प्रकाशित कवरेज पर आगे बढ़ी थी विवेचना
निघासन कांड मामले में पुलिस ने शुरुआती तफ्तीश में इसे आत्महत्या कहा। प्रदेश स्तर पर मामला गहराने के बाद हत्या की धाराओं में ही छह आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा था। अमर उजाला ने पूरे मामले में पुलिस की केस डायरी से लेकर अदालत तक में पुलिस की दोहरे बयानबाजी को उजागर करना शुरू कर किया, तो तीसरे पर्चे में पुलिस ने सामूहिक दुष्कर्म की धारा 376 डी और घर में घुसने की धारा 452 आईपीसी लगाई थी। चूंकि अपहरण का मामला था, लिहाजा पुलिस को 364 आईपीसी लगानी पड़ी थी। इसके लिए अमर उजाला में बेबाक खबरें प्रकाशित हुई थीं। यही कारण है कि अदालत में पुलिस को यह लिखना पड़ा कि पहले पर्चे में गलती से पुलिस रिमांड में सामूहिक दुष्कर्म की धाराएं लिखने से छूट गई थीं।
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