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बाघ बढ़ाने की कोशिश में  भूल गए तेंदुओं का वजूद      

Thu, 25 May 2017 11:41 PM IST
अनिल मिश्र       बांकेगंज। 
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तेंदुए - फोटो : अमर उजाला
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तराई के तेंदुओं पर शिकारी लगाए रहते हैं घात, संकट में तेंदुओं का कुनबा
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बाघों के संरक्षण की मुहिम में वन विभाग लुप्त हो रहे दुर्लभ तेंदुओं की परवाह करना ही भूल गया। इसके चलते इनके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। दक्षिण खीरी वन प्रभाग के जंगलों में 15-20 साल पहले बड़ी तक संख्या में तेंदुए थे। अब इनकी संख्या घटकर काफी कम रह गई है। साउथ खीरी डिवीजन के मैलानी, भीरा, गोला और मोहम्मदी रेंज में 2013 की वन्यजीव गणना के दौरान सिर्फ सात तेंदुए मिले थे, इसमें छह नर और एक मादा थी।      
पिछले दिनों बाघों की गणना के लिए लगाए गए कैमरों से बाघों के साथ-साथ तेंदुओं की आबादी भी पता चलेगी। कैमरा ट्रैपिंग के जरिए हुई गणना के परिणाम अक्टूबर-नवंबर में आने की संभावना है। हालांकि तेंदुओं के मिल रहे पगचिह्न को देखते हुए वन विभाग इनकी आबादी में बढ़ोत्तरी की संभावना जता रहा है। गणना के परिणाम आने के बाद ही यह पता चल सकेगा कि खीरी के जंगलों में तेंदुए बढ़ रहे हैं या इनकी संख्या में कमी आ रही है। 
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वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि बाघों के दबाव के चलते तेंदुए प्राय: जंगल के बाहरी हिस्से में रहना पसंद करते हैं। यह अक्सर आबादी में आकर पालतू बकरियों और कुत्तों का शिकार कर लेते हैं। जंगल के बाहरी हिस्सों में रहने के कारण तेंदुए शिकारियों के निशाने पर रहते हैं। पांच साल पहले मैलानी रेंज की भरिगवां बीट के उत्तरी कठिना कंपार्टमेंट छह में तेंदुए के शिकार के लिए लगाए गए कुड़के में एक बाघ फंस गया था। वन विभाग ने लखनऊ से ट्रेंक्युलाइजर विशेषज्ञ उत्कर्ष शुक्ला को मौके पर बुलाकर कुड़के में फंसे बाघ को ट्रेंक्युलाइज करने के बाद लखनऊ चिड़ियाघर भेज दिया था। इसके एक-दो माह बाद ही बाद इसी बीट में भरिगवां गांव से सटे किसान के खेत में दो तेंदुआ शावक पाए गए। इन तेंदुआ शावकों को सुरक्षा के लिहाज से लखनऊ चिड़ियाघर भेज दिया गया। करीब दस साल पहले कतर्निया घाट के जंगल से भटक कर आए तेंदुए ने धौरहरा क्षेत्र में कई लोगों को मौत के घाट उतारा और कई को घायल किया। इससे गुस्साए ग्रामीणों ने तेंदुए को एक घर में बंद कर उसे जिंदा जला दिया। साफ जाहिर है कि बाघों से ज्यादा तेंदुए खतरे में हैं। तेंदुओं के संरक्षण के प्रति वन विभाग की उदासीनता के कारण ही तेंदुओं की संख्या लगातार घट रही है। यदि यही रवैया रहा तो आने वाले दस-बीस सालों में तराई की धरती से तेंदुओं का नामों निशान मिट जाएगा। फिलहाल तराई के साउथ खीरी डिवीजन, दुधवा टाइगर रिर्जव में इनकी आबादी भले ही संतोषजनक न हो लेकिन बहराइच जिले के करतनिया घाट में तेंदुए अपनी अच्छी उपस्थित दर्ज करा रहे हैं। कतर्निया घाट के जंगलों में 32 तेंदुए हैं। इनमें सात नर और 25 मादा है। पिछली गणना में खीरी जिले में जो तेंदुए मिले थे उसमें छह नर और एक मादा थी। यदि यह अनुपात उल्टा होता तो तेंदुओं की आबादी बढ़ने की संभावनाएं  भी प्रबल होती। यहां पर मादा तेंदुओं की संख्या कम होने के कारण आबादी नहीं बढ़ पा रही है। 
उधर प्रसिद्ध वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह का कहना है जहां टाइगर होते है वहां तेंदुए कम होते हैं। बाघों के दबाव के चलते तेंदुए जंगल के बाहरी किनारों और गांव व कस्बे की ओर चले जाते है। तेंदुआ बडे़ पशुओं का शिकार नहीं करता। तेंदुए जंगल के बाहरी किनारों और गांव कस्बों में बकरी, कुत्ता, बछड़ा, हिरन आदि का शिकार कर उन्हें निवाला बनाते है। तेंदुआ छोटे पशुओं के शिकार के बाद बाघ उसे निवाला न बना पाए इसलिए शिकार को पेड़ पर टांग देता है। बाघ पेड़ पर चढ़ना नहीं जानता। तेंदुआ का पसंदीदा आहार कुत्ता होता है। बाघों की तरह तेंदुओं का संरक्षण भी जरूरी है।      
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वन विभाग बाघों की तरह तेंदुओं के संरक्षण के प्रति पूरी तरह गंभीर है। वन कर्मी बाघों के साथ ही तेंदुओं की निगरानी भी करते है। साउथ खीरी डिवीजन के जंगलों में बाघ और तेंदुओं के प्राकृतिक आवास, भोजन और पानी की कोई कमी नहीं है। इस साल हुई गणना का परिणाम आने पर तेंदुओं की संख्या में बढ़ोत्तरी पता चल सकेगी।       
आरएन मिश्र, उप-संभागीय वनाधिकारी, दक्षिण खीरी वन प्रभाग गोला रेंज।
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