भाई दूज पर लौटने की थी योजना
ऋषिकेश से लखनऊ की ओर लौट रहे मंजीत ने बस से ही फोन पर बात करते हुए बताया कि 17 दिन की कहानी बेहद दर्द भरी है। पूरी बातें बताएं तो बहुत समय लग जाएगा। वह बताते हैं कि दो महीना पहले 10 सितंबर को वह उत्तरकाशी में काम करने गए थे, लेकिन ठीक दो महीने बाद हादसा हो गया। उन्होंने सोचा था कि 12 नवंबर को वह काम निपटाकर भाई दूज के त्योहार पर अपने घर जाएंगे लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। हम लोग जीवन और मौत के संघर्ष से जूझते रहे।
चार इंची पाइप के जरिये भेजे जाते थे खाद्य पदार्थ
मंजीत ने फोन पर बताया कि 17 दिन वह काजू, किशमिश, चना, बिस्किट आदि खाकर रहे। चार इंच के पाइप के जरिये खाद्य पदार्थ सुरंग में भेजे जाते थे। इसके लिए बाहर से पाइप में हवा का तगड़ा प्रेशर दिया जाता था, ताकि खाद्य पदार्थ सुरंग में हम लोग तक पहुंच जाएं। मंजीत ने फोन पर बताया कि सभी साथी मुश्किल वक्त में एक परिवार के तौर पर रहे। सब एक दूसरे का हौसला बढ़ाते रहे।
उन्होंने बताया कि खाने के बाद पीने के पानी के लिए टनल के पड़ोस एक पहाड़ से रिसता हुआ जल प्यास बुझाता था। जबकि, दैनिक क्रिया के लिए दूर टनल में जाते थे। जहां फंसे थे, वहां से दो किमी तक लंबी टनल थी। इसलिये वह खाली समय में वहां पर चहलकदमी करते थे। मंजीत ने बताया कि पहले तो पाइप के जरिये ही तेज आवाज में टनल के अंदर से चिल्लाकर बात करते थे।
सुरंग के बाहर फोन रखा जाता था, जिससे दूसरे तरफ की आवाज पाइप के जरिये हम तक आती थी और बाद में हम लोग चिल्लाकर अपनी बात पाइप के माध्यम से सुरंग के बाहर रखे फोन को पहुंचाते थे। मंजीत ने बताया कि इसके बाद माइक्रोफोन की व्यवस्था की गई थी, जो पाइप के जरिये टनल में आता था और फिर हम लोग रेस्क्यू में लगे लोगों व परिवार वालों से बात करते थे।