शिवजी की प्रियनगरी छोटी काशी उनकी पत्नी सती जी को भी प्रिय रही है। यहां वह मां मंगला देवी के नाम से जानी जाती हैं। देवालय में काले पत्थर की प्रतिमा पुराणों में भद्र कर्णिका के नाम से विख्यात हैं।
मत्स्य पुराण में कथा है कि पिता दक्ष के यज्ञ में बिना निमंत्रण के पहुंचीं शिव की पत्नी सती ने वहां शिवजी का स्थान न देखकर योगाग्नि में अपने को भस्म कर लिया। जलती सती से दक्ष ने उत्तम योग और तप के लिए सती के दर्शन और स्तुति स्थलों के नाम पूछे तो देवी जी ने अपने 108 तीर्थ स्थलों का उल्लेख किया। उनमें 18वां स्थान गोकर्ण तीर्थ को बताया और कहा कि वह यहां भद्र कर्णिका के नाम से स्थापित हैं।
पुष्करे पुरुहूतेति केदारे मार्ग दायिनी, नन्दा हिमवत: प्रष्ठे गोकर्णे भद्रकर्णिका। अध्याय13/30।शक्ति पीठों का यह विवरण पद्म पुराण, देवी भागवत पुराण और स्कंद पुराण में भी मिलता है।
अमंगल से रखती हैं मुक्त
खुटार मार्ग के समीप मंदिर में मां भद्र कर्णिका की सिंह वाहिनी चतुर्भुजी मूर्ति है। मंदिर के निकट ही तीर्थ प्रवाहित होता था। भक्तों को अमंगल से मुक्त रखने के कारण उनका नाम मंगला हो गया। कहते हैं कि अपने भक्तों का संकट माता अपने ऊपर ले लेती हैं। 42वर्ष पूर्व बिजली गिरी, जिससे मंदिर का शिखर ध्वस्त हो गया था। इससे किसी के घर को कोई नुकसान नहीं हुआ। तभी से मां के प्रति लोगों की आस्था और भी बढ़ गई।
दर्शन से पूर्ण होती है मनोकामना
स्कंद पुराण में कहा गया है कि जो मनुष्य तीर्थ स्नान कर देवी मंदिर में दर्शन करते हैं या प्रात:काल शक्ति पीठों के नामों का पाठ करते हैं वह सभी पापों से मुक्त होते हैं। इन स्थलों में जो भी शरीर का त्याग करता है वह ब्रह्मलोक को भेदकर शिवजी के परम धाम को जाता है। इहलोक में माता अपने भक्त की कामना पूर्ण कर उसे ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। गोदान के समय, श्राद्ध में, विवाह या अन्य मंगल कार्यों में देवार्चन के समय इन नामों का पाठ करने वालों का भी ब्रह्म पद की प्राप्ति होती है।