भले ही यह महज चौंकाने वाला संयोग हो लेकिन बीते 13 साल में जिले से जुड़े लोगों की हत्या के तीन मामले न केवल सुर्खियों में रहे बल्कि इन तीनों का नाम अंग्रेजी के एम से शुरू हुआ।
‘एम’ फैक्टर की शुरुआत लखीमपुर शहर के मोहल्ला मिश्राना की रहने वाली कवियत्री मधुमिता शुक्ला से शुरू हुई। मधुमिता शुक्ला की लखनऊ के पेपर मिल में वर्ष 2002 में हत्या कर दी गई थी। मधुमिता की हत्या के मामले में प्रदेश के तत्कालीन मंत्री अमरमणि त्रिपाठी को जेल जाना पड़ा था।
सियासत और अपराध के गठजोड़ से अपराधों का सिलसिला वर्ष 2008 में बसपा सरकार के कार्यकाल में भी सामने आया, जब पीडब्ल्यूडी के अधिशाषी अभियंता मनोज गुप्ता की औरैया में तैनाती के दौरान हत्या वहां के एक विधायक के इशारे पर कर दी गई थी। मनोज गुप्ता शहर के मोहल्ला नई बस्ती के रहने वाले थे। बीते नौ सितंबर की रात बरेली में पशु तस्करों ने जिले के गांव हरदासपुर में रहने वाले दरोगा मनोज मिश्रा की हत्या कर दी। इस मामले में हत्यारोपियों का सत्ता से गठजोड़ सामने आ रहा है। अब इस मामले की सीबीआई जांच की मांग की जा रही है।