जिले के पुलिस सिस्टम को ऑनलाइन करने के लिए साढ़े पांच साल पहले लगाए गए
110 कंप्यूटर कबाड़ बन गए हैं। इन कंप्यूटरों को खरीदने पर 35 लाख 50 हजार
रुपये खर्च किए गए थे।
वर्ष 2009 में केंद्र सरकार ने पुलिस महकमे को
सीपा (कॉमन इंटीग्रेटेड पुलिस एप्लीकेशन) प्रोजेक्ट दिया था। प्रोजेक्ट के
तहत जिले के सभी 22 थानों को ऑनलाइन किया जाना था और इसके लिए हर थाने को
तीन से पांच, सीओ ऑफिस को एक-एक, गोपनीय कार्यालय, प्रधान लिपिक शाखा,
डीसीआरबी, आंकिक शाखा समेत सभी कार्यालयों में 110 कंप्यूटर लगाए गए थे। एक
कंप्यूटर सेट और प्रिंटर पर करीब पैंतीस हजार रुपये की लागत आई थी। शुरुआत
में हर थाने में कंप्यूटर विशेषज्ञ भी तैनात किए गए थे। योजना के तहत हर
दरोगा को लैपटॉप भी दिया जाना था, ताकि मौके पर ही रिपोर्ट दर्ज कर एफआईआर
की प्रति वादी को दी जा सके तथा विवेचना में आसानी हो।
योजना शुरुआती
दिनों में ही दम तोड़ गई, क्योंकि इतनी बिजली ही नहीं मिल पाई कि कंप्यूटर
चल सकें। कुछ जगह इसके लिए जेनरेटर भी खरीदे गए, लेकिन डीजल खरीदने और
इन्हें चलाने की व्यवस्था नहीं की गई। यही नहीं, इस दौरान कंप्यूटर
विशेषज्ञ भी हटा लिए गए।
नोडल अधिकारी/एएसपी-सीपा प्रोजेक्ट, कुंवर ज्ञानंजय सिंह ने बताया कि सीपा प्रोजेक्ट से लगाए गए सभी
कंप्यूटर बिजली के अभाव और स्टाफ न होने से खराब हो गए हैं। इस बारे में
पुलिस मुख्यालय को रिपोर्ट भेजी जा चुकी है।
ये होता फायदा
वादी को प्रथम सूचना रिपोर्ट की कंप्यूटराइज्ड प्रति मिलती।
प्रथम सूचना रिपोर्ट ऑनलाइन होने से घर बैठे हो जाती जानकारी।
विवेचना में होनी वाली खानापूरी पर नियंत्रण।
अपराध और अपराधियों को डॉटा ऑनलाइन होता।
अपराध नियंत्रण और अपराधियों की गिरफ्तारी में सहूलियत।
अपराध संख्या डालते ही मिल जाती कार्यवाही की जानकारी।