बांकेगंज। किशनपुर सेंक्चुरी में पिछले 15 दिन से डेरा डाले नेपाली हाथियों की निगरानी में लगे वन कर्मियों और ट्रैकर्स को भनक भी नहीं लग पा रही कि वे जंगल से कब और किधर निकल गए। मंगलवार की रात पांच हाथी जंगल से निकलकर चौथी बार पहाड़नगर गांव के खेतों में जा धमके। धान और गन्ने की फसलें रौंद डालीं। वन कर्मियों और ट्रैकर्स को तो इस बारे में बुधवार सुबह पता चला।
वन कर्मियों और पश्चिम बंगाल से आए 24 एक्सपर्ट ट्रैकर्स की टीमें मंगलवार रात हाथियों की लोकेशन ट्रेस नहीं कर पाईं। जंगल और बाहरी किनारों पर सन्नाटा पसरा देख वनकर्मी और ट्रैकर्स ने राहत महसूस कर रहे थे। जबकि जंगल में मौजूद 30 हाथियों के झुंड से पांच हाथी जंगल से निकलकर फिर पहाड़नगर गांव जा धमके। किसान नेतराम और श्रीराम की एक एकड़ से अधिक धान और गन्ने की फसलें रौंद डालीं और जंगल लौट गए। ग्रामीणों को इसकी जानकारी नहीं हो सकी। बुधवार सुबह जब किसान अपने खेतों की ओर पहुंचे तो रौंदी हुईं फसल देख हाथियों के आने का अहसास हुआ। उन्होंने वन कर्मियों को सूचना दी। फॉरेस्टर मोहम्मद उमर, आकाश खरवार और वन्यजीव रक्षक राजेश यादव मौके पर पहुंचे। वे वहां की हालत देख दंग रह गए।
शुरुआती दिनों में लगातार अपना ठिकाना बदलने वाले इन हाथियों ने पिछले 12 दिनों से लगातार किशनपुर सेंक्चुरी को ही अपना आशियाना बनाया है। लगता है कि उन्हें यह जंगल काफी रास आ गया है। अफसरों और एक्सपर्ट ट्रैकर्स का मानना है कि अब ये नेपाली हाथी दुधवा जंगल छोड़कर नेपाल जाने वाले नहीं लगते।
वन्यजीवों की किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता। वन कर्मियों और पश्चिम बंगाल से आए एक्सपर्ट ट्रैकर्स को हाथियों की निगरानी के निर्देश दिए गए हैं। प्रयास यह है कि हाथियों का झुंड आबादी की ओर रुख न कर सके। - डॉ. अनिल कुमार पटेल, डीडी, डीटीआर, बफरजोन।