बाघों के घर तक इंसानी घुसपैठ के चलते वे इंसानी आबादी में दस्तक दे रहे हैं। जंगल से सटी भूमि पर हो रही खेती से बाघों के प्राकृतिक आवास में खलल बढ़ रहा है। गन्ने की खेती बाघों के आबादी के पास तक आने में सहायक भी साबित हो रही है। जंगल में जलौनी लकड़ी, झोपड़ी बनाने के लिए फूस और बल्लियों आदि के लिए लोग जंगल में जाते हैं और अनायास ही बाघों के हमले का शिकार होते हैं।
बाघ लंबी ऊंची घास में रहना पसंद करते हैं। गन्ने की फसल और नरकुल के जंगल बाघ के लिए एक जैसे हैं। जंगल से सटे खेतों में जब गन्ने की फसल खड़ी होती है तो हिरन, नीलगाय और जंगली सुअर भी आकर इन खेतों में शरण लेते हैं। जब बाघ का भोजन खेतों में हो तो बाघों का उनके पीछे खेतों में आना स्वाभाविक है। जंगल से निकले यह बाघ अक्सर खेतों से होते हुए आबादी के निकट तक आ जाते हैं। तराई इलाके में गन्ने की पैदावार बढ़ने के साथ बाघों के जंगल से बाहर आने की घटनाओं में इजाफा हुआ है। इससे वन्यजीव और इंसान दोनों का ही जीवन खतरे में पड़ रहा हैं।
इसी सप्ताह अलग-अलग दो घटनाओं में बाघों ने हमला कर दो लोगों को घायल कर दिया। 18 मार्च को दक्षिण खीरी वन प्रभाग के मैलानी रेंज जंगल में नारंग गांव निवासी जीतलाल अपने दो साथियों के साथ छप्पर डालने के लिए फूस काटने गया था। जहां झाड़ियों में छिपे बाघ ने उस पर हमला कर दिया। इस घटना के ठीक दो दिन बाद पलिया क्षेत्र में इमलिया फार्म के निकट गन्ना काटने गए मजदूर गया प्रसाद पर खेत मेें छिप कर बैठे बाघ ने हमला कर उसे घायल कर दिया। इसमें पहली घटना जंगल के अंदर हुई तो दूसरी घटना जंगल से सटे खेत में।
पहले भी बाघ के हमले का शिकार हो चुके कई लोग
इससे पहले पिछले साल जंगल से निकले एक बाघ ने भरिगवां और छेदीपुर गांवों में आठ लोगों को अपना निवाला बनाया था। बाद में उसे ट्रैंकुलाइज करके लखनऊ चिड़ियाघर भेज दिया गया जहां वह अपने गुनाहों की सजा काट रहा है। इससे पहले संपूर्णानगर रेंज के कांपटांडा में नौ लोग बाघ का निवाला बने थे। हाल ही में पीलीभीत जिले में बाघ कई लोगों को निवाला बना चुका है।
प्रजनन और बच्चा देने के समय बढ़ते हैं बाघों के हमले
तराई में गन्ने की खेती में इजाफा होने से बाघ और तेंदुओं के खेतों में आने की प्रवृत्ति बढ़ी है। जंगल में इंसानी दखलंदाजी के चलते बाघ खेतों की ओर रुख कर रहे हैं। सर्दियों का मौसम बाघों के प्रजनन का और फरवरी मार्च का महीना इनके बच्चा पैदा करने का समय होता है। इन दिनों बाघिन जंगल के बाहरी हिस्सों या खेतों के किनारे लगी झाड़ियों में आ जाती है। जब इनके आसपास इंसानी हरकत होती है तो बाघिन हमलावर हो जाती है। शावकों के बड़ा होने तक बाघिन ज्यादा सतर्क रहती है। इन दिनों गन्ना कटने के बाद भी बाघ आसपास की झाड़ियों में सक्रिय हैं। इससे बाघों के हमले हो रहे हैं।
- डॉ. वीपी सिंह, वन्यजीव विशेषज्ञ, राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य
खीरी के जंगलों में अनुकूल वातावरण, पर्याप्त भोजन, पानी और सुरक्षा मिलने से बाघों का कुनबा बढ़ रहा है। बाघ गणना के लिए मोहम्मदी रेंज में लगाए गए कैमरों से वहां तीन वयस्क और एक शावक की मौजूदगी की पुष्टि हुई है। इसी तरह खीरी के अन्य जंगलों में भी बाघों की संख्या बढ़ रही है। इससे यह जंगल से बाहर भी आ रहे हैं। हालांकि वन विभाग इनकी बराबर मानीटरिंग कराता है। जंगल में इंसानी दखलंदाजी भी बाघों को जंगल से बाहर निकलने पर मजबूर कर रही है।
अखिलेश पांडेय, डीएफओ साउथ