जिले में मिनी कामधेनु योजना के माध्यम से दुग्ध उत्पादन के प्रयासों को उम्मीदों के अनुरूप सफलता नहीं मिल पा रही है। एक तो बड़ा प्रोजेक्ट होने के कारण पशुपालक हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। वहीं पशुपालकों को बैंकों से ऋण प्राप्त करने में भी परेशानियां होती हैं। इसके चलते सरकार की यह योजना लक्ष्य से काफी दूर है।
बताते चलें कि पशुपालकों को रोजगार उपलब्ध कराने और दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से शासन ने पहले कामधेनु डेयरी योजना शुरू की थी। यह योजना करीब एक करोड़ की थी। इसमें सौ दुधारू पशुओं के माध्यम से डेयरी प्रोजेक्ट की शुरुआत होती थी। इसमें जिले के एक पशुपालक ने ऋण स्वीकृत कराया। इसके बाद शासन ने मिनी कामधेनु डेयरी योजना शुरू की। इस योजना के तहत 52,35,000 रुपये की लागत से डेयरी शुरू कराना था। इस योजना में 25 प्रतिशत मार्जिन मनी पशुपालक को जमा करने पर शेष 75 प्रतिशत धनराशि लगभग 39,26,000 रुपये बैंक से ऋण लेना होता है। इस ऋण के ब्याज की अदायगी शासन स्तर से होनी थी। इस योजना में जिले के कई पशु पालक आए और लक्ष्य के अनुरूप विभाग ने 30 पशुपालकों का चयन कर उनकी फाइलें बैंक को भेज दीं लेकिन बैंक से लगभग 16 आवेदन अस्वीकृत हो गए। करीब 11 फाइलें स्वीकृत भी हो गई हैं और कुछ फाइलें अभी तक बैंकों में विचाराधीन हैं। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि बैंक के ऋण की अदायगी न होने पर शासन की कोई जिम्मेदारी नहीं है।
पशुपालकों की दिक्कतें
योजना के तहत बैंक कृषि योग्य भूमि को बंधक नहीं बना रहे हैं इसके लिए पशुपालक के पास कामर्शियल भूमि होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालकों के पास कामर्शियल भूमि नहीं होती है। दूसरा विकल्प हैं किसान बैंक को सेल डीड लिखकर दें। इस पर किसान को भूमि के मूल्य का दो प्रतिशत स्टांप ड्यूटी के रूप में देना होता है। इसके अलावा योजना की 25 प्रतिशत धनराशि लगभग 13 लाख रुपये पशुपालक को जमा करनी होती है यह भी जुटाना पशुपालकों के लिए आसान नहीं होता है।
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी एसपी सिंह ने कहा कि हम पशुपालकों को प्रशिक्षण से लेकर अन्य तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराते हैं। ऋण स्वीकृत पशुपालक को ही कराना होता है। बैंक जब ऋण अदायगी को लेकर संतुष्ट हो जाते हैं तभी ऋण देते हैं हम बैंकों को ऋण देने के लिए बाध्य भी नहीं कर सकते हैं। लक्ष्य पूरा करने के लिए विभाग फिर पशु पालकों का साक्षात्कार करेगा।