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Lakhimpur Kheri News: जंगल सुरक्षित, गांव असुरक्षित... तराई में बढ़ता वन्यजीव-मानव संघर्ष

Fri, 20 Mar 2026 11:45 PM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
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उत्तम कुमार
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पलियाकलां। एक ओर 21 मार्च को विश्व वानिकी दिवस के मौके पर पौधरोपण और गोष्ठियां हो रही होंगी, वहीं दुधवा टाइगर रिजर्व और कतर्निया घाट के बफर जोन से सटे गांवों में हालात इसके उलट हैं। यहां जंगल अब सुकून नहीं, बल्कि दहशत का कारण बन चुका है। धौरहरा से लेकर पलिया तहसील तक कई गांवों में शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है और लोग घरों में कैद होने के लिए मजबूर हैं।
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बीते कुछ महीनों में तराई क्षेत्र में बाघ, तेंदुए और हाथियों की गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। दुधवा और कतर्निया घाट से सटे धौरहरा, निघासन और पलिया क्षेत्र के खेतों व आबादी के आसपास इनकी मौजूदगी आम हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि अब केवल मवेशी ही नहीं, बल्कि इंसानों की जान भी खतरे में है। कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि कई हमलों में घायल हुए हैं।
वन विभाग वन मित्र, गज मित्र और जागरूकता अभियानों के जरिये लोगों को सतर्क करने का दावा कर रहा है, लेकिन ग्रामीणों के अनुसार संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त और पिंजरों की व्यवस्था नाकाफी साबित हो रही है। लोगों में गुस्सा है और उनका कहना है कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं।
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मुआवजा प्रक्रिया भी ग्रामीणों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। उनका कहना है कि प्रक्रिया जटिल है और महंगाई के मुकाबले मुआवजा कम है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जंगल की सुरक्षा के साथ-साथ उन ग्रामीणों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी, जो पीढ़ियों से इन जंगलों के किनारे रह रहे हैं। संवाद
-इसलिए बढ़ रहा संघर्ष
पूर्व वन अधिकारी एवं वन्यजीव विशेषज्ञ अशोक कुमार कश्यप ने बताया कि वन्यजीवों का टेरिटोरियल व्यवहार इसका बड़ा कारण है। जंगल में संख्या बढ़ने पर नए, कमजोर या बूढ़े जानवर अपना इलाका छोड़कर आबादी की ओर आ जाते हैं। भोजन और पानी की तलाश भी एक अहम कारण है। जंगल में शाकाहारी जीवों की कमी होने पर मांसाहारी जानवर गांवों की ओर रुख करते हैं, जहां उन्हें पालतू या लावारिस पशु आसानी से मिल जाते हैं। इसके अलावा बढ़ती आबादी और खत्म होते कॉरिडोर भी टकराव को बढ़ा रहे हैं। खेतों में काम करते समय झुके हुए इंसान को जानवर शिकार समझकर हमला कर देते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, गन्ने की फसल घास परिवार से जुड़ी होने के कारण बाघ और तेंदुओं को घास के मैदान जैसी लगती है। यहां उन्हें छिपने, सुरक्षा और शिकार तीनों की सुविधा मिल जाती है, जिससे वे आबादी के करीब पहुंच रहे हैं।

वन्यजीवों को कोर एरिया में बनाए रखने के लिए ग्रासलैंड, वाटर होल और सोलर पंप जैसी व्यवस्थाएं की जा रही हैं। उनकी गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है और ग्रामीणों को भी जागरूक किया जा रहा है।
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-डॉ. जगदीश आर, डिप्टी डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व


तेंदुए द्वारा बच्चे को मारने के बाद से अब तक दहशत बनी हुई है। तेंदुआ पकड़ा गया, लेकिन डर खत्म नहीं हुआ। अब लोग वॉक पर भी नहीं निकलते।
-सर्वजीत सिंह, सीते देवीपुर
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सुबह काम के लिए निकलते हैं, लेकिन शाम को लौटते समय डर बना रहता है। झाड़ियों में कहीं भी बाघ या तेंदुआ हो सकता है। अब लोग बाहर सोने से भी डरते हैं।
-एडवोकेट राजू भार्गव, फुलवरिया


शाम होते ही घरों के दरवाजे बंद हो जाते हैं। बाजार का सामान भी पहले ही ले आते हैं, क्योंकि डर रहता है कि कहीं हमला न हो जाए।
-अनिल कुमार, देवीपुर गजरौरा


बाघ-तेंदुए का आतंक काफी समय से है। कई लोग घायल हो चुके हैं और मवेशियों को भी नुकसान हुआ है। डर के कारण लोग खेतों तक नहीं जा पा रहे।”
-उत्तम कुमार, बेलाकलां
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वन्यजीव-मानव संघर्ष (अक्तूबर 2025 – मार्च 2026)
6 अक्तूबर : मन्नालाल की मौत (धौरहरा)
9 अक्तूबर: प्रीत कौर (8) की मौत (निघासन)
13 नवंबर : डिंपल (5) की मौत (पलिया)
14 नवंबर : चंद्रिका प्रसाद की मौत (संपूर्णानगर)
8 दिसंबर: राम बहादुर की मौत (मझगईं)
30 दिसंबर: सिराजुद्दीन की मौत (धौरहरा)
21 जनवरी: आराध्यम (5) की मौत (पलिया)
जनवरी : जंग बहादुर की मौत (थारू क्षेत्र)
11 जनवरी: ऊषा देवी की मौत (निघासन)
2 मार्च : राजकमल (14) की मौत (तिकुनिया)
7 मार्च: प्रगट सिंह की मौत (संपूर्णानगर)
16 मार्च : मनोज कुमार की मौत (हैदराबाद)

उत्तम कुमार

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