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बाघ का शिकार होता रहा और वन विभाग को खबर तक नहीं 

Mon, 01 Jan 2018 08:13 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला,लखीमपुर खीरी
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Forest
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खटीमा में पकड़े गए शिकारियों से एक बार फिर तराई के जंगलों में हो रहे बाघों के शिकार का खुलासा हुआ है। दुधवा टाइगर रिजर्व के बफरजोन में शामिल मैलानी, भीरा रेंज और नेपाल से सटे जंगलों में बाघ का शिकार कर और बेशकीमती अंगों को बड़े तस्करों के हाथ बेचे जाने के मामले पहले भी सामने आ चुके है। बाघ संरक्षण के लिए विशेष रूप से आरक्षित जंगलों में बाघों के हो रहे शिकार से एक बार फिर वन विभाग की लापरवाही उजागर हुई है। 
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ऊधमसिंह नगर जिले के खटीमा में रविवार को पकड़े गए शिकारी बांकेगंज कस्बे से पांच किलोमीटर दूर स्थित ढाका के महावीर पुत्र लोकराम और गोला थाना क्षेत्र के राजू पुत्र बाबूराम कमलापुर गांव के हैं। वन विभाग की संयुक्त टीम ने इनके पास से 13 फीट लंबी बाघ की खाल और 8.3 किलो हड्डियां बरामद की हैं। इन दोनों ने यह स्वीकार किया कि उन्होंने इस बाघ का शिकार मैलानी रेंज की जटपुरा बीट के बरौंछा नाले के पास अर्जुन पौधरोपण क्षेत्र में किया। मालूम हो कि बरौंछा का किनारा बाघों के लिए पसंदीदा प्राकृतिक आवास हमेशा से रहा है। यहां पूरे साल बाघों का बसेरा रहता है। बावजूद इसके वन विभाग इनकी निगरानी की सुरक्षा के प्रति कभी खास गंभीर नहीं रहा। यही कारण है कि यहां कभी बाघ का शिकार हो जाता है, तो कभी यहां बाघ इंसान का शिकार कर लेता है। 

पहले महुरैना रेंज में हुई थी 
बाघ के शिकार की घटना 
मैलानी रेंज की ही महुरैना बीट में वर्ष 2007-08 में शिकारियों ने एक बाघ को बंदूक की गोली से मार डाला था। बाद में शिकारी बाघ की खाल और दूसरे अंग बेचने का प्रयास ही कर रहे थे कि वन विभाग को इसकी भनक लग गई औैर वे वेष बदलकर खरीददार के रूप में शिकारियों के पास जा पहुंचे और सौदेबाजी करने के बाद पुष्टि होने पर उन्हें धर दबोचा। बाघ शिकार की इस घटना में बांकेगंज कस्बे से सटे देवीपुर, अर्जुनपुर और अमखेरवा गांव के नौ शिकारी शामिल थे। उनके पास से बाघ की खाल, मांस, दांत, नाखून सहित कई अंग बरामद हुए थे।
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तस्कर स्थानीय लोगों से कराते हैं शिकार 
भारत-नेपाल सीमा पर सक्रिय अंतरराष्ट्रीय स्तर के वन्यजीव तस्कर मैलानी रेंज के जंगलों से बाघ और दूसरे जंगली जानवरों का शिकार कराने के लिए स्थानीय लोगों की मदद लेते हैं। यह स्थानीय लोगों को मोटी रकम देकर उनसे शिकार कराते हैं और उनकी खाल और दूसरे कीमती अंगों को निश्चित स्थान पर पहुंचाने को कहते हैं। इसके आगे का काम बड़े तस्करों की दूसरी टीम करती है। 

वन्यजीव अंगों की चीन और भूटान में है भारी मांग 
राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य डॉ. वीपी सिंह का कहना है कि चीन और भूटान में वन्यजीव अंगों विशेषकर बाघ की खाल और हड्डियों की मांग रहती है। बाघ और तेंदुआ की खाल से बनी जैकेट और कैप पहनना वहां को लोग अपनी शान समझते हैं। यह खालें बेहद ऊंची कीमत पर बिकती है और सड़कों के किनारे भी आसानी से उपलब्ध हो जाती है। चीन के लोग बाघ की हड्डियों से टाइगर वॉइन बनाते हैं। यह वॉइन वहां बेशकीमती मानी जाती है। बाघ के मांस का शक्तिवर्धक दवा बनाने में इस्तेमाल होता है। चीन औैर भूटान के लोग नाखून और दांत की माला बनाकर पहनने के बेहद शौकीन होते हैं। इस तरह बाघ का हर अंग बेशकीमती होता है और मरने के बाद एक बाघ की कीमत करोड़ों में रहती है। इसके चलते बाघ का शिकार थम नहीं रहा है। 

गरीबी का फायदा उठाते हैं तस्कर 
स्थानीय लोगों की गरीबी का तस्कर भरपूर फायदा उठाते हैं और उन्हें कुछ रकम देकर तस्कर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। बाघ की खाल और हड्डियों के साथ खटीमा में पकड़े गए ढाका और कमलापुर निवासी महावीर और राजू दोनों मजदूर पेशा हैं। इसी का फायदा उठाकर तस्करों ने इन्हें अपना मोहरा बनाया और अब यह संगीन वन अपराधों में लिप्त हो चुके हैं। वन विभाग का दावा है कि यह बावरिया या तोताराम गिरोह के मोहरे हो सकते हैं। फिलहाल, वन विभाग की टीम पूरे मामले की तहकीकात में जुटी है।

संरक्षित वन क्षेत्र में बाघ के शिकार की घटना गंभीर है। मामले की पूरी छानबीन कराई जाएगी। यदि कोई वन कर्मी इसमें संलिप्त पाया गया तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। साथ ही बाघों की सुरक्षा के इंतजाम और पुख्ता किए जाएंगे।
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- डॉ. अनिल पटेल, डीएफओ और डीडी, बफरजोन, दुधवा टाइगर रिजर्व
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