मैगलगंज। रात में अपनी टिमटिमाती रोशनी से मनमोह लेने वाले जुगनू अब विलुप्ति की कगार पर हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, आज की पीढ़ी शायद आखिरी मानी जा सकती है, जो इन जुगनुओं की टिमटिमाहट देख पा रही है। जुगनुओं की विलुप्ति का बड़ा कारण खेतों में किया जाने वाला कीटनाशक दवाओं का छिड़काव है।
जुगनू घास, झाड़ियों और दलदली इलाकों में रहना पसंद करते हैं। शहरीकरण और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण इनके रहने के प्राकृतिक स्थान मिटते जा रहे हैं। जुगनू अपने संचार और प्रजनन के लिए रोशनी का उपयोग करते हैं। नर और मादा जुगनू अपनी चमक के माध्यम से एक-दूसरे से संपर्क करते हैं।
बढ़ती स्ट्रीट लाइट्स, वाहनों की रोशनी और घरों की बाहरी लाइटिंग इस प्राकृतिक प्रक्रिया को बाधित कर रही है। प्रकाश प्रदूषण उनके जीवनचक्र को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है।
जुगनू केवल सुंदरता का प्रतीक नहीं, बल्कि जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र का अहम हिस्सा हैं। इनका तेजी से घटता अस्तित्व पर्यावरण प्रेमियों और वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। कई राज्यों में कुछ प्रजातियां अब लगभग विलुप्त मानी जा रही हैं। (संवाद)
जुगनू को बचाने के यह हैं उपाय
- प्राकृतिक आवासों की रक्षा की जाए। खेतों के आसपास घास, झाड़ियों और दलदली क्षेत्रों को नष्ट न किया जाए।
- कीटनाशकों का सीमित उपयोग हो। जैविक खेती को बढ़ावा मिले जिससे जुगनू जैसे कीट जीवित रह सकें।
- प्रकाश प्रदूषण को नियंत्रित किया जाए। रात में अनावश्यक रोशनी का प्रयोग रोका जाए।
स्कूलों में बढ़ाई जाए जागरूकता
स्कूलों, कॉलेजों और ग्राम सभाओं में जुगनू संरक्षण को लेकर अभियान चलाए जाएं। यदि अब भी हम नहीं जागे तो अगली पीढ़ी के लिए जुगनू केवल किताबों और कहानियों तक ही सीमित रह जाएंगे। यह समय है जब हमें प्रकृति के इस चमकते जीव की रोशनी को हमेशा के लिए बुझने से बचाना होगा।
लूसीफेरिन नामक रसायन के कारण आती है चमक
वन्य जीव विशेषज्ञ केके मिश्रा ने बताया कि जुगनू के विलुप्त होने का सबसे बड़ा कारण कीटनाशक दवाएं हैं, जिनका आजकल हर एक खेत में छिड़काव हो रहा है। जुगनू के अंदर लूसीफेरिन नामक एक रसायन होता है, जो हवा के साथ क्रिया करके रोशनी देता है, हालांकि इसके संरक्षण के लिए अभी कोई उपाय नहीं किया गया है।