गौरतलब है कि दुधवा के जिप्सी चालकों ने आरोप लगाया था कि डीएम के इशारे पर उनकी जिप्सियों को उठाया गया, फिर उन्हें सीज करने और किशनपुर में कर्मियों की पिटाई आदि भी की गई। इसी के चलते 28 जनवरी से उन्होंने कार्य बहिष्कार कर रखा है। इसके चलते करीब दो दिन दुधवा नेशनल पार्क में सैलानियों को भ्रमण नहीं कराया जा सका था। बुधवार की सुबह सभी जिप्सी चालक, गाइड, दैनिक कर्मी मुख्यालय में एकत्र हुए और यहां फेडरेशन के पदाधिकारी और सदस्य भी आ गए। उन्होंने यहां धरने पर बैठक कर प्रदर्शन और नारेबाजी की। कहा कि वह आंदोलन में शामिल हो चुके हैं और जब तक शामिल रहेंगे जब तक मामले में कार्रवाई नहीं होती।
लाखों का नुकसान और साख पर बट्टा लगा
पलियाकलां। दुधवा नेशनल पार्क का पर्यटन इस दौरान कई दिन बंद हो चुका है, इससे दुधवा के राजस्व को लाखों का नुकसान हुआ है। 15 नवंबर को दुधवा नेशनल पार्क के नवीन सत्र का उद्घाटन होता है। सूत्रों के मुताबिक पर्यटकों से प्रवेश शुल्क के रूप में करीब दस हजार रुपये पार्क को मिलते थे। प्राइवेट वाहनों से रोड टैक्स के रूप में प्रति वाहन करीब तीन सौ रुपये वसूल किए जाते थे। यहां रोजाना करीब 25 से 30 वाहन यहां आ जाते थे, जिससे प्रतिदिन इससे आए करीब 75 सौ रुपये थी। सलूकापुर से हाथी की सवारी कराई जाती थी और यहां मौजूद पांच हाथी करीब तीन चक्कर प्रतिदिन पर्यटकों को सैर कराते थे। प्रति चार व्यक्ति हाथी की सवारी का किराया छह सौ रुपये है। इससे हाथी एक दिन में करीब 15 चक्कर लगाते थे और इससे करीब नौ हजार रुपये की आय प्रतिदिन थी।
थारू हट खाली और पसरा चारों ओर सन्नाटा
- कैंटीन में भी दिख रहा है सन्नाटा
पलियाकलां। हालात के चलते दुधवा में तमाम सैलानियों को मायूसी का सामना करना पड़ा है और तमाम मायूसी के साथ वापस लौट गए हैं। कई ने हालात को देखते हुए यहां आने का कार्यक्रम ही स्थगित कर दिया है। दुधवा में चारों ओर सन्नाटा पसरा है और कैंटीन में भी सन्नाटा ही दिख रहा है।
फेडरेशन समेत कई संगठनों के प्रदेश पदाधिकारी आएंगे दुधवा
फेडरेशन ऑफ फारेस्ट, वन रक्षक संघ समेत कई संगठनों के प्रदेश पदाधिकारी एक दो दिन में यहां आ रहे हैं और वह यहां आकर दुधवा पहुंचकर आंदोलन को गति देंगे।
वन्य जीवों की सुरक्षा राम भरोसे
पलियाकलां। फेडरेशन ऑफ फारेस्ट की हड़ताल से पार्क संपदा और वन्यजीवों की सुरक्षा अब राम भरोसे हो गई है। पार्क की सीमाएं खुली हैं और ज्यादातर नेपाल और भारतीय आबादी वाले क्षेत्रों से सटी हुईं हैं। इन पर इतने कर्मियों की तैैनाती के बाद भी कटान और शिकार का खतरा मंडराता रहता है। अगर कर्मी ही नहीं हुए तो इनकी सुरक्षा व्यवस्था का क्या हाल होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
शस्त्र और हाथी जमा करने का एलान
फेडरेशन के पदाधिकारियों ने कहा है कि अगर उनकी मांग पूरी नहीं होती है तो वह छह फरवरी को अपने शस्त्र जमा कर देंगे। इसके बाद वह पालतू हाथियों को प्रशासन को सौंप देंगे।