सिकुड़ते जंगल और जंगलों में बढ़ती इंसानी दखलंदाजी के चलते पिछले तीन दशकों सेे इंसानों और बाघों के बीच टकराव की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं लेकिन इधर इसमें एक नया मोड़ आया है। जंगल के किनारे बसे लोगों के लिए बाघ से अधिक जंगली सुअर खतरनाक साबित हो रहे हैं।
जिले में पिछले तीन महीने के अंदर ही अलग-अलग घटनाओं में जंगली सुअर दर्जनों ग्रामीणों को घायल कर चुके हैं। इस बीच तीन जंगली सुअर ग्रामीणों के गुस्से का शिकार भी हुए। देखने में आया है कि बाघ और इंसानों के बीच टकराव की घटनाएं ज्यादातर सर्दियों के मौसम में होती हैं। जबकि गर्मियां शुरू होते ही जंगली सुअरों का आतंक शुरू हो जाता है। वन्यजीव विशेषज्ञ बताते हैं कि जंगल से सटे गन्ने के खेतों में हिरन और जंगली सुअर आ जाते हैं। बाघ भी अपने शिकार के पीछे खेतों तक आ पहुंचते हैं। गन्ना कटाई के समय अक्सर बाघों और इंसानों के बीच आमना-सामना हो जाता है।
इधर मार्च-अप्रैल में गन्ना कटने के बाद सैकड़ों की संख्या में जंगली सुअर जंगल वापस जाने के बजाय खेतों और सड़कों के किनारे लगी झाड़ियों में ही रह गए। यहां उन्हें पर्याप्त भोजन और पानी भी मिल रहा है। ऐसे में खेतों और तालाबों के किनारे लोगों पर जंगली सुआरों का हमला बढ़ गया है।
ग्रामीणों के गुस्से का शिकर हुए तीन जंगली सुअर
पिछले दो माह के अंदर तीन जंगली सुअर ग्रामीणों के गुस्से का शिकार हुए। इसमें तीन अप्रैल को बांकेगंज के गांव अर्जनपुर, 23 मई को मितौली क्षेत्र के गांव गोपालपुर और नकहा में ग्रामीणों ने सुअरों को घेर कर मार डाला।
ये रहीं घटनाएं
पिछले दो माह के अंदर जंगली सुअरों और इंसानों के बीच दो दर्जन से भी अधिक टकराव की घटनाएं हुई हैं। इसमें बांकेगंज में पांच, जंगबहादुरगंज में 13, गोपालपुर में चार और नकहा में 11 लोगाें को जंगली सुअरों ने हमला कर गंभीर घायल कर दिया। इसमें जंगबहादुरगंज के गांव नरायनपुर में जंगली सुअर के हमले में 12 वर्षीय किशोर नीरज की मौत हो गई।
डीएफओ, साउथ खीरी नीरज कुमार ने बताया कि वन्यजीव अकारण हमलावर नहीं होते। स्वयं पर किए गए हमले के बचाव के चलते वे हिंसक हो कर इंसानों पर हमला कर देते है।