केशवापुर। सरकार की मंशा थी कि ग्रामीणों को 24 घंटे स्वास्थ्य लाभ मिले, लेकिन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) सेमरई में स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। यहां दो दशक पहले लाखों की लागत से बने आवासीय भवन आज सरकारी अनदेखी के कारण खंडहर में तब्दील हो चुके हैं।
इन आवासों का निर्माण इस उद्देश्य से किया गया था कि डॉक्टर और कर्मचारी अस्पताल परिसर में ही रुकें, ताकि आपात स्थिति में मरीजों को रात में भी इलाज मिल सके। विडंबना यह है कि इन भवनों में आज तक एक भी स्वास्थ्यकर्मी नहीं रुका। देखरेख के अभाव में अब ये भवन जहरीले जीव-जंतुओं और मधुमक्खियों का अड्डा बन चुके हैं, जिससे स्थानीय निवासियों में भी दहशत बनी रहती है।
स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, जर्जर हालत और जहरीले जीवों के डर से डॉक्टर और स्टाफ यहां रुकने का साहस नहीं जुटा पाते। नतीजा यह है कि अस्पताल केवल दिन के उजाले तक ही सीमित रह गया है। शाम ढलते ही अस्पताल परिसर में सन्नाटा पसर जाता है और दरवाजे बंद हो जाते हैं।
अस्पताल की स्थिति इतनी बदहाल है कि कई बार डॉक्टर की अनुपस्थिति में कंपाउंडर ही मरीजों को देखने के लिए मजबूर होते हैं। रात के वक्त बीमार पड़ने वाले ग्रामीणों के लिए यह पीएचसी सफेद हाथी साबित हो रहा है। आपात स्थिति में मरीजों को भारी खर्च कर शहर या दूरदराज के निजी अस्पतालों की दौड़ लगानी पड़ती है।
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सेमरई में लाखों रुपये खर्च कर अस्पताल का निर्माण कराया गया। फिर भी स्वास्थ्य सेवाएं मुश्किल से सात घंटे ही मिल पा रही हैं।
-अंजनी कुमार दीक्षित, जिलाध्यक्ष, राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन
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इस अस्पताल में 8-10 किलोमीटर दूर से लोग इलाज के लिए जाते हैं। एकल स्टाफ केवल दिन में ही स्वास्थ्य सेवाएं देता है।
-पंकज राज, ग्राम प्रधान, सेमरई
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क्षेत्र में हिंसक वन्यजीव रात को किसानों पर हमला कर घायल कर देते हैं। इलाज के लिए लोगों को शहर के अस्पतालों में जाना पड़ता है।
-विजय कुमार मिश्र, बीडीसी सदस्य
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मरम्मत कार्य का कोई बजट नहीं आता है। इसकी सूचना उच्च अधिकारियों को भेजी जा चुकी है। अभी कोई जवाब नहीं आया है।
-अमित बाजपेयी, सीएचसी प्रभारी, फरधान
विजय कुमार मिश्र
विजय कुमार मिश्र
विजय कुमार मिश्र