दो बार भारतेंदु हरीशचंद्र पुरस्कार समेत कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित और धौरहरा के रहने वाले वरिष्ठ कहानी व उपन्यासकार संजीव जायसवाल ने संगोष्ठी की शुरुआत करते हुए कहा कि सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि हमें शुद्धता अपनानी है या स्वीकार्यता बढ़ानी है। पूरे देश में अगर हिंदी को लागू करना है तो हमें बोलचाल की भाषा को पूरे देश में लागू करना होगा। बोलचाल में तो हमारी सहज भाषा रहती है, लेकिन लिखावट में हम विद्वता दिखाने लगते हैं।- संजीव जायसवाल, पूर्व आईआरपीएस अधिकारी, धौरहरा
अगर हिंदी को सहेजने के सही परिदृश्य में सोचा गया होता तो हमें आज हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हिंदी दिवस नहीं मनाना पड़ता। हिंदी इतनी क्लिष्ट नहीं होनी चाहिये कि समझ में न आए। संविधान में हिंदी राजभाषा है, जबकि इसे राष्ट्रभाषा होना चाहिये था। सहज, सरल हिंदी की भाषा को आज नेपाल, त्रिनिनाद और मॉरीशस तक में मान्यता मिल रही है, लेकिन हमारे अपने देश में सरकारी हिंदी बेहद क्लिष्ट है। इसे जन जन की और राष्ट्र की भाषा बनाना होगा। - डॉ. मीनाक्षी तिवारी, प्राचार्य, गुरुनानक कन्या इंटर कॉलेज
क्लिष्टता हिंदी को व्यापक और समृद्ध बनाती है। हिंदी भाषा में लालित्य को भी बनाए रखना है। इसलिए क्लिष्टता का अपना सौंदर्य है। लक्षणा और अभिव्यंजना का सरकारी कामकाज की भाषा में लोप होता है। वहीं हमारे लोकशब्द और तत्सम भाषा को भी महत्व देना है। दोनों का अपना अस्तित्व बना रहे, इसके लिये लिये सबसे बेहतर निदान यह है कि सभी स्कूलों में संस्कृत को अनिवार्य किया जाये, जिससे शुरुआत से ही छात्रों में भाषा का सौंदर्यबोध परिलक्षित होता रहेगा। - गौरव शुक्ल, साहित्यकार एवं अवधी सम्राट स्व. बंशीधर शुक्ल के पौत्र
एक सर्वे के मुताबिक जहां जहां देशज भाषा में पढ़ाई हुई है। वहां छात्रों का परीक्षा परिणाम अन्य भाषाओं के मुकाबले 18 फीसदी ज्यादा आया है। कई बार अनुवाद ने भी हिंदी का बेड़ा गर्क किया है। जैसे सरकारी भाषा के शब्दों की उत्पत्ति के लिये अलग से आयोग है, वैसे ही बोलचाल और सरकारी भाषा में एक सेतु बनाने की जरूरत है। इसके लिए भी अलग से संस्था की जरूरत है, जो लोकभाषा और सरकारी कामकाज की भाषा में सेतु बना सके। - भारतेंदु प्रकाश त्रिवेदी, वरिष्ठ पत्रकार एवं संस्थापक मॉर्सेल,
सरकारी व्यवस्था में हिंदी का सबसे ज्यादा महत्व है। यहां पूरा कामकाज ही हिंदी में है। अगर हम हिंदी के साथ राष्ट्रीयता के भाव भी जोड़ सकें तो निश्चित ही उससे हिंदी और सशक्त और समृद्ध होकर राष्ट्रव्यापी होगी। साथ ही अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ जैसे अभियान लगातार होते रहने चाहिये। जिससे नई पीढ़ी हिंदी को दरकिनार न कर सके और हिंदी को अपनाने से अपने देश की राष्ट्रीयता के भाव के खुद को जोड़ सके।- स्वाति शुक्ला, एसडीएम, मोहम्मदी
हिंदी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा और अभिव्यक्ति का सरल माध्यम है, पर क्लिष्टता इसकी ग्राह्यता कम करती है। हिंदी के अस्तित्व पर कोई प्रश्न उत्पन्न हो रहा है। ऐसा प्रतीत नहीं होता। फादर कामिल बुल्के जैसे विदेशी भी हिंदी के प्रति अपना स्नेह और प्रेम प्रदर्शित करते हैं। यही कहना है कि ‘अभी और निखरेगी, अभी और संवरेगी, मधुवन सी सारे जग में महकेगी हिंदी’।- मधु श्रीवास्तव, अजमानी इंटरनेशनल स्कूल, लखीमपुर खीरी
कोई भाषा तभी सर्वग्राही हो सकती है जब वह सरल हो और आम बोलचाल में प्रयुक्त होती हो। सरकारी हिंदी को वास्तव में इतना क्लिष्ट बना दिया गया है कि शासनादेशों को समझ पाना आम लोगों के बस की बात नहीं है। एक तरह से सरकारी तंत्र की वजह से हिंदी अपने गौरवशाली स्थान हासिल नहीं कर पा रही है। जो भाषा बोलचाल में हो वही लिखी जानी चाहिए और सरकारी भाषा के रूप में भी ऐसी ही सरल भाषा का प्रयोग होना चाहिए। - डॉ. आर के जायसवाल, अवकाश प्राप्त, डीआईओएस, लखीमपुर खीरी