रामचरित मानस के कुछ अंशों की रचना अवध क्षेत्र का हिस्सा रहे लखीमपुर के धौरहरा कस्बे में हुई। सोलहवीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसी दास के धौरहरा प्रवास करने, बाल कांड और सुंदर कांड की रचना करने के प्रमाण मिलते हैं। बाल कांड और सुंदर कांड की पांडुलिपि आज भी यहां सुरक्षित हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने जिस चबूतरे पर बैठकर रामचरित मानस की रचना की वह चबूतरा तुलसी चौरा के नाम से विख्यात है। कई अन्य प्रमाण भी यहां तुलसीदास के प्रवास और रामचरित मानस की रचना स्थली होने को पुष्टि करते हैं।
धौरहरा कस्बे से सटा हुआ राम बटी है। गोस्वामी तुलसी दास ने यहां प्रवास कर बाल कांड और सुंदर कांड की रचना की। जिस चबूतरे पर बैठकर उन्होंने रामचरित मानस की रचना की वह 100 फुट लंबा और 80 फुट चौड़ा आयताकार तुलसी चौरा आज भी मौजूद है। इसी चबूतरे के एक सिरे पर तुलसीदास द्वारा रोपित विशाल वट वृक्ष इसकी प्रचीनता को प्रमाणित करता है।
रामचरित मानस के सुंदर कांड की मूल पांडुलिपि दुलही गांव में सुंदर लाल दीक्षित के परिवार में सुरक्षित है। अब इसकी देखरेख जागेश्वर प्रसाद दीक्षित कर रहे हैं। इसे गोरखपुर की गीता प्रेस ने मूल और प्रामाणिक माना है। उधर धौरहरा में दीपेंद्र मिश्र का परिवार अपने यहां बाल कांड की पांडुलिपि होने का दावा कर रहा है।
प्रमुख धार्मिक स्थल बन गया रामबटी
रामबटी का विशाल परिसर अब एक प्रमुख धार्मिक स्थल बन चुका है। परिसर में करीब 70 फुट ऊंचा एक भव्य मंदिर है। यह करीब 12 फुट ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ है। तुलसी चौरा चारों तरफ हरे भरे पेड़ों से घिरा हुआ है। यहां के बड़े मैदान में आए दिन मेले लगते और तमाम धार्मिक आयोजन होते हैं।