दुधवा नेशनल पार्क भारत के नेशनल पार्कों में नंबर दो की हैसियत रखता है। यूं तो सभी नेशनल पार्कों की अपनी अलग खासियत है लेकिन जो दुधवा का अलौकिक वातावरण और विलुप्त प्रजाति के वन्यजीव मिलते हैं उनसे दुधवा की शान अलग ही है। यही कारण है कि सैलानियों को दुधवा पार्क खूब भाता है।
दुधवा नेशनल पार्क एवं किशनपुर पशु विहार को 1987-88 में भारत सरकार के प्रोजेक्ट टाइगर परियोजना में शामिल किया गया था और भारत के राष्ट्रीय पार्कों में चल रहे प्रोजेक्ट टाइगर में दुधवा ने दूसरा मुकाम पाया था। विश्व की अनूठी गैंडा पुनर्वास परियोजना के 30 सदस्यीय गैंडा परिवार के स्वछंद घूमते सदस्य पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहते हैं और इसलिए बड़ी तादाद में सैलानी और वन्यजीव विशेषज्ञ यहां आते रहते हैं।
यूरोप, साइबेरिया आदि बर्फीले क्षेत्रों के विदेशी प्रवासी पक्षी भी शीतकाल के दौरान दुधवा पार्क के तालाबों एवं झीलों में देखे जाते हैं। इसमें यहां पाए जाने वाले बंगाल फ्लोरिकन एवं लेसर फ्लोरिकन दुर्लभ पक्षी भी दुधवा पार्क की पहचान बन चुके हैं। प्राकृतिक वैभव से परिपूर्ण दुधवा नेशनल पार्क के मनोहारी दृश्य देखने के साथ ही पशु-पक्षियों का कलरव पर्यटकों के लिए रोमांचकारी होता है। दुधवा आने वाले पर्यटकों की पहली पसंद बाघ दर्शन की होती है और दूसरी इच्छा गैंडा दर्शन की। दुधवा नेशनल पार्क की दक्षिण सोनारीपुर रेंज के 27 वर्ग किमी के वन क्षेत्र को ऊर्जाबाड़ से संरक्षित जंगल में गैंडा पुनर्वास परियोजना चलाई जा रही है। सन 1984 में शुरू की गई पुनर्वास परियोजना में इस समय तकरीबन 30 सदस्यीय गैंडा परिवार दुधवा आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बिंदु हैं।