दुधवा कर्मियों का आंदोलन जारी है। उन्होंने बृहस्पतिवार को प्रदर्शन और नारेबाजी की। इसके साथ ही कर्मी अब नौ मार्च को इसी मांग को लेकर होने वाली रैली की तैयारियों में जुट गए हैं। फेडरेशन उपाध्यक्ष रामकुमार ने कहा कि अब तक उनकी मांग पूरी नहीं हुई और मांग पूरी न होने पर नौ मार्च को लखनऊ में पूरे प्रदेश के वनकर्मियों ने रैैली करने का एलान किया था। इस रैली के बाद आगे के निर्णय लिए जाएंगे।
दुधवा के राजस्व को 70 लाख का चूना
दुधवा नेशनल पार्क का पर्यटन एक महीने से भी ज्यादा दिनों से बंद है और इसमें अब तक करीब 70 लाख रुपये का चूना लग चुका है। आंकड़े अनुमानित हैं रकम और ज्यादा भी हो सकती है। फिलहाल दुधवा के बंद पर्यटन से उसकी साख देश विदेश में खराब हो रही है और पर्यटक यहां आना अब पसंद नहीं कर रहे हैं।
15 नवंबर को दुधवा नेशनल पार्क के नवीन सत्र का उद्घाटन होते ही यहां पर्यटकों का जमावड़ा लग गया था। सब कुछ ठीक ठाक चल ही रहा था कि बीच में डीएम और वनकर्मियों में विवाद तूल पकड़ गया। इससे भी खास फर्क नहीं पड़ा लेकिन जब कर्मियों ने 30 नवंबर को कार्य बहिष्कार के साथ पर्यटन को भी बंद कर दिया तो राजस्व को चूना लगने लगा। इसके दो दिन बाद पर्यटन फिर शुरू हो गया लेकिन 16 और 17 दिसंबर को फिर पर्यटन फिर ठप हो गया। बाद में प्रशासन के कुछ अधिकारियों और फेडरेशन आफ फारेस्ट के बीच एक करार से मामला शांत हो गया। लेकिन इसके बाद पार्क के जिप्सी चालकों ने 27 जनवरी को डीएम पर फिर से कई आरोप लगा कर हड़ताल शुरू कर दी। बाद में हड़ताल में करीब छह दिन बाद कर्मी भी शामिल हो गए। 27 जनवरी से लेकर अब तक दुधवा में पर्यटन ठप है। इसको एक माह से अधिक का समय हो चुका है। ऑन लाइन बुकिंग बंद तो नहीं है लेकिन बुकिंग कराने वालों को हालात बता दिए जा रहे हैं जिससे कोई भी यहां की बुकिंग नहीं करा रहा है। राजस्व को हुए नुकसान को देखा जाए तो पीक समय में एक माह में यह रकम करीब 50 से 60 लाख रुपये हो जाती है इसके अलावा हाथी की सवारी, प्रवेश शुल्क, वाहन इंट्री आदि को जोड़ दिया जाए तो ये रकम करीब 70 लाख रुपये पहुंचती है। यह रकम अनुमानित है। नुकसान इससे अधिक हो सकता है।
आते थे रोजाना तकरीबन सौ पर्यटक
पार्क सूत्रों के मुताबिक यहां तकरीबन प्रतिदिन सौ पर्यटक आते थे। इसको सही माना जाए तो इनसे प्रवेश शुल्क के रूप में प्रतिदिन करीब दस हजार रुपये पार्क को मिलते थे। जो 30 दिन के औसत से करीब तीन लाख रुपये बन जाते हैं।
प्राइवेट वाहनों से आय थी लाखों की
इसके अलावा पार्क में पहुंचने वाले प्राइवेट वाहनों से रोड टैक्स के रूप में प्रति वाहन प्रतिदिन करीब तीन सौ रुपये वसूले जाते थे। आम दिनों में तकरीबन 25 से 30 वाहन यहां आ जाते थे और इससे प्रतिदिन करीब 75 सौ रुपये की आय थी। इसको भी जोड़ लें तो एक माह में यह रकम करीब 2.25 लाख बन जाती है।
हाथी की सवारी में भी नुकसान
सलूकापुर से हाथी की सवारी कराई जाती थी और यहां मौजूद पांच हाथी करीब तीन चक्कर प्रतिदिन पर्यटकों को सैर कराते थे। प्रति चार व्यक्ति हाथी की सवारी का किराया छह सौ रुपये था। हिसाब किया जाए तो हाथी एक दिन में करीब 15 चक्कर लगाते थे और इससे प्रतिदिन करीब नौ हजार रुपये की आय होती थी और महज एक माह को ही जोड़ा जाए तो यह रकम करीब 2.70 लाख बनती है।
अन्य मदों में भी नुकसान
पर्यटन ठप होने से जिप्सी चालकों, गाइड आदि को भी नुकसान हुआ है हालांकि ये रकम दुधवा के राजस्व में नहीं जोड़ी जाती है लेकिन नुकसान तो है ही।