फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Sawan 2023: देवकली की मिट्टी जहां रखी होती है, वहां नहीं आते सांप; जानिए कहां है ये अनूठा शिव मंदिर

Thu, 13 Jul 2023 05:43 PM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी

सार

लखीमपुर शहर से पश्चिम में करीब नौ किलोमीटर दूर स्थित पौराणिक देवकली तीर्थ है। देवकली तीर्थ को लेकर मान्यता है कि यहां की मिट्टी जहां रखती होती है, वहां सर्प नहीं आते। यहां नागपंचमी पर भव्य मेला लगता है। 
विज्ञापन
देवकली तीर्थ स्थल - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

लखीमपुर खीरी जिले में एक ऐसा धर्मस्थल है, जिसके बारे में मान्यता है कि यहां की मिट्टी जहां रख दी जाए वहां सांप नहीं आते। लखीमपुर शहर से पश्चिम में करीब नौ किलोमीटर दूर स्थित यह स्थान पौराणिक देवकली तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। यह जगह महाभारत कालीन राजा जन्मेजय की नाग यज्ञ स्थली के रूप में जाना जाता है।

विज्ञापन


कहा जाता है कि राजा जन्मेजय ने अपने पिता राजा परीक्षित की मौत का बदला लेने के लिए यहीं पर सर्प यज्ञ किया था। राजा परीक्षित की मौत तक्षक नाग के डसने से हुई थी। कभी देवस्थली के नाम से प्रसिद्ध इस स्थान का नाम बिगड़ते-बिगड़ते देवकली हो गया। नाग पूजा और काल सर्प योग निवारण के लिए तंत्र साधना का यह प्रमुख केंद्र है। नाग पंचमी के दिन लोग सर्पकुंड की मिट्टी अपने घरों में लेकर जाते हैं, जिससे उन्हें नागों और सर्पों का डर नहीं रहता। 

ये भी पढ़ें- धोखाधड़ी: ऑनलाइन ऑर्डर किया था 29 हजार रुपये का एसी, पार्सल में निकला कुछ ऐसा जिसे देख ग्राहक रह गया दंग
विज्ञापन


किवदंती यह भी है कि कलयुग के प्रारंभ में यहां राजा देवक हुए। उनकी पुत्री देवकली ने यहीं तपस्या की थी। उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम देवकली पड़ा। राजा देवक ने ही यहां पर देवेश्वर शिव मंदिर की स्थापना की थी। मंदिर परिसर में एक खंडित शिवलिंग स्थापित है। बताते हैं कि मुगलों ने इसे नष्ट करने की कोशिश की थी, लेकिन वह इसे सिर्फ खंडित ही कर पाए थे।

विज्ञापन

देवकली तीर्थ में स्थापित हैं खंडित शिवलिंग - फोटो : अमर उजाला
देवकली का देवस्थली के रूप में पारासर पुराण के तीर्थ महात्म्य में उल्लेख मिलता है। महाभारत कालीन कई पुराणों और ग्रंथों में यहां राजा जन्मेजय द्वारा कराए गए नाग यज्ञ का भी उल्लेख है। नेपाल के एक संत भवानी प्रसाद उपाध्याय उर्फ नेपाली बाबा इस स्थान की खोज करते हुए यहां पहुंचे थे। 
 

ये भी पढ़ें- बेटी तूने ये क्या किया?: शादी के दो माह बाद दुल्हन ने दी जान, पत्नी का शव देख पति भी फंदे से लटका, ये थी वजह


उन्होंने सर्पकुंड की खुदाई कराई तो पांच फिट की गहराई के बाद राख मिश्रित काली मिट्टी मिली। राजा जन्मेजय की नागयज्ञ स्थली की पुष्टि होने के बाद नेपाली बाबा ने देवकली में चंद्रकला आश्रम की स्थापना की, जो आज भी है। नेपाली बाबा का करीब दो साल पहले निधन हो चुका है। उनके द्वारा स्थापित आश्रम, द्वादश ज्योर्तिलिंग और अन्य देवमूर्तियां आज भी मौजूद हैं।

सूर्य उपासना का प्रमुख केंद्र है देवकली

देवकली सूर्य उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है। देवेश्वरनाथ शिव मंदिर के ठीक सामने 70 मीटर लंबा और 60 मीटर चौड़ा एक मनोरम तीर्थ हैं, जिसमें उत्तर की ओर पक्की सीढ़ियां बनी हुई हैं। महिलाओं के स्नान के लिए स्नानघाट बना है। यह तीर्थ सूर्यकुंड के नाम से प्रसिद्ध है। सूर्यकुंड होने से यह प्रमाणित होता है कि यह स्थान सूर्य उपासना का प्रमुख केंद्र रहा होगा।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें