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जेलों में अब भी लागू है अंग्रेजों का मैनुअल

Mon, 26 Jan 2015 12:48 AM IST
लखीमपुर खीरी
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हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं, शोले फिल्म का यह डायलॉग सबकी जुबान पर आज भी है पर जेल मेैनुअल में आज भी ब्रितानी जमाने के तमाम नियम नहीं बदले हैं। आजकल हर हाथ में घड़ी है और लोग मोबाइल पर ही समय देख लेते हैं लेकिन जेलों में अंग्रेजों के जमाने की तरह रोजाना कई बार पचासा घंटा बजाया जाता है। अंग्रेजों के जमाने में यह समय बताने की गरज से लगाया गया था।
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जेल मैनुअल के पैरा 813 में मशक्कत का आशय बंदियों से जेल में परिश्रम वाला काम कराने से है। बंदियों को सामग्री छटांक में दी जाती है। मुलाहिजा शब्द भी चलन में है, जिसके तहत जेल में लाए गए बंदी के शरीर पर पहचान चिह्न अंकित किए जाते हैं। यही नहीं, जैल मैनुअल के पैरा 803 में अब भी कोर्ट से परमीशन लेकर जेलर किसी भी बंदी को उस बैरक में डाल सकता है, जिसे तन्हाई कहा जाता है और पहले इसमें खूंखार बंदियों को रखा जाता था। बेड़ी और कोड़ों की सजा का भी प्रावधान अब तक है। कोड़ों की सजा पर सुप्रीम कोर्ट रोक लगा चुका है। फि र भी मैनुअल से कठिन परिश्रम देने की सजा का अधिकार खत्म नहीं किया गया है।
लखीमपुर की जिला जेल में अब भी कटघरा यानि सर्किल है। वहीं पर आरोपी बंदी की पेशी लगाई जाती है। इसमें तलवा परेड होती है, जिससे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बंदियों को बेड़ी और हथकड़ी लगाने का भी प्रावधान है। फिर भी कोर्ट की परमीशन लेकर बंदियों कोे हथकड़ी लगाई जा सकती है।
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