शनिवार को आखिरी घर भी बह गया, शरणार्थी बन गए 130 परिवार
एक था हुलासपुरवा। 130 परिवारों की यह बस्ती अब नहीं है। घाघरा नदी के किनारे हरियाली से भरपूर यह मजरा अब नदी के गर्भ में समा चुका है। खेत मकान सब बह गए हैं। आज वहां घाघरा की डरावनी लहरें ठाठें मार रही हैं। शुक्रवार की रात गांव का आखिरी घर भी घाघरा में समा गया। दो सौ एकड़ खेत पहले ही बह चुका है।
ईसानगर ब्लाक की ग्राम पंचायत रुद्रपुर में कुल छह मजरे सिद्धनपुरवा, हुलासपुरवा, निहालपुरवा, जनकपुरवा और कुटीपुरवा थे। इनमें सिद्धनपुरवा मजरा पिछले साल ही घाघरा में समा चुका है। इस साल एक माह के अंदर 45 घरों और 130 परिवारों वाला पूरा हुलासपुरवा गांव साफ हो गया। पांच जुलाई को घाघरा ने जब इस गांव का कटान शुरू किया तो पूरे गांव में हाहाकार मच गया। गांव के लोगों ने तिनका तिनका जोड़ कर बनाए अपने घरों को तोड़कर पलायन करना शुरू कर दिया। पांच अगस्त की रात गांव का आखिरी घर भी नदी में समा गया। हुलासपुरवा में सिर्फ तीन झोपड़ियां थीं, बाकी सभी घर पक्के थे। गांव की खुशहाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गांव के अधिकांश लोगों के पास ट्रैक्टर ट्रालियां थीं। अच्छी तरह जीवन यापन करने भर को जमीन थीं, लेकिन पिछले एक महीनों में उनकी खुशियां तिनका-तिनका कर बिखर गईं। घाघरा ने लोगों को बेघर ही नहीं भूमिहीन और बेरोजगार भी कर दिया।
शरणार्थियों की तरह पड़े हैं
हुलासपुरवा गांव में कटान से बेघर हुए लोग इधर-उधर खानाबदोशों की तरह रहने को मजबूर हैं। प्रेम कुमार के परिवार ने एनआरएचएम के भवन में शरण ले रखी है। यहीं डूब चुके सिद्धनपुरवा गांव का स्कूल भी चल रहा है। जहूर, याकूब, मुस्तफा, बहराइची, इकबाल पंचायत भवन में हैं। जबकि बाबूराम, राजेंद्र, राजकुमार, मिश्रीलाल, तीरथराम, राम सिंह और मलखान समेत दर्जनों लोग सड़कों के किनारे बरसाती तान कर जीवन गुजार रहे हैं।
हुलासपुरवा गांव के सभी 45 घरों के कटने की सूचना मिल चुकी है। पीड़ितों की सूची तैयार कर भेज दी गई है। पैसा आते ही पक्के मकान स्वामियों को 95100 और कच्चे घर वालों को 4100 रुपये गृह अनुदान के रूप में दिए जाएंगे। सभी कटान पीड़ित परिवारों को तिरपाल और पिपिया दी गयी है। -लव कुमार, एसडीएम