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पिता-पुत्र की हत्या में दो सगे भाइयों सहित आठ को उम्रकैद

Sun, 01 Feb 2015 12:15 AM IST
लखीमपुर खीरी
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पुरानी रंजिश के चलते पिता-पुत्र की निर्मम हत्या करने के मामले में एडीजे हाजी अशरफ अंसारी ने 11 हत्याभियुक्तों को दोषी साबित पाया। इनमें से दो सगे भाइयों सहित आठ हत्यारोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। साथ ही सभी पर 11-11 हजार रुपये का जुर्माना भी डाला गया है। तीन दोष सिद्ध हत्यारोपियों को किशोर अपचारी घोषित होने के कारण उनकी पत्रावली किशोर न्याय बोर्ड भेजी गई है।
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अभियोजन पक्ष रखते हुए एडीजीसी रामस्वरूप वर्मा ने बताया कि कोतवाली के ग्राम गरकटिया निवासी सिद्दीक हुसैन और गांव के ही नईम के परिवार में प्रधानी के चुनाव को लेकर रंजिश चल रही थी। इसी बीच 17 सितंबर 1988 को जब मियांवालेपुरवा से कल्लू के  साथ मोपेड से सिद्दीक हुसैन गांव लौट रहे थे तभी गांव के ही नईम और उसके लड़के मतीन, मोईन और गांव के गजोधर, छोटे मियां, कौशल, साहबदीन, गोले, प्रहलाद, श्रीधर, विश्राम मायाराम, बाबूराम तथा ग्राम रामदास पट्टी के निवासी छोटेलाल, ग्राम सरैंया निवासी विजय उर्फ झगडू तथा शहर के गोकुलपुरी मोहल्ला निवासी मदनलाल ने बंदूक, तमंचा, बांका, लाठी-डंडा से लैस होकर धावा बोल दिया। सरेआम ही सिद्दीक हुसैन को धारदार हथियार और गोली कर मौत के  घाट उतार दिया। जब उसके लड़के रफीक हुसैन ने पिता को बचाने की कोशिश की तो उसे भी मौके पर ही मार डाला। कोतवाली पुलिस ने हत्यारोपी के कब्जे से हत्या में प्रयुक्त तमंचा भी बरामद किया था। जांच के बाद सभी 16 हत्याभियुक्तों के खिलाफ  चार्जशीट दाखिल हुई थी। कोर्ट में अतीक हुसैन, मोहम्मद लईक के अलावा डॉ. वीके चोपड़ा, एसआई प्रेम शंकर, तत्कालीन कोतवाल ओमप्रकाश तथा एसआई विश्राम लाल की गवाही दर्ज की गई। कोर्ट ने शनिवार को अपने फैसले में गोले, श्रीधर विश्राम मायाराम, बाबूराम, छोटेलाल और मदनलाल को दोषसिद्ध पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। साथ ही सभी पर 11-11 हजार रुपये का जुर्माना भी डाला है। हत्यारोपी प्रहलाद पर आर्म्स एक्ट का केस भी साबित होने के कारण उसे उम्रकैद के साथ ही 13 हजार रुपये के  जुर्माने की सजा सुनाई है। उधर मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही नईम, कौशल, साहबदीन, विजय उर्फ झगडू, तथा गया प्रसाद दिवंगत हो गए।
18 साल बाद कोर्ट में घोषित हुए किशोर
मामले में दिलचस्प है कि 17 सितंबर 1988 की वारदात के बाबत अदालत में पहली बार 2006 में हत्यारोपी मतीन और छोटेमियां को घटना के वक्त नाबालिग करार दिया गया। तो इसके बाद हत्यारोपी मुईन की अर्जी पर 2013 में उसे भी घटना के समय नाबालिग पाया गया। यही वजह है कि कोर्ट ने शनिवार को अपने फैसले में किशोर घोषित तीन हत्याभियुक्तों की सजा के बिंदु पर कोई फैसला नहीं सुनाया है।
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किशोर अपचारी को अधिकतम तीन साल की कैद
हालांकि कानून की परिभाषा मेें हत्या एक जघन्य अपराध है, लेकिन किशोर न्याय अधिनियम के अधीन अपचारी किशोर के प्रति नरमी बरती गई है। कानूनी जानकार पूर्व एडीजीसी शैलेंद्र सिंह गौड़ बताते हैं कि अपचारी किशोर को कानून के मुताबिक अधिकतम तीन साल तक की सजा ही दी जा सकती है।
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