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संवेदनहीनता की मिसाल है किशोरी की कहानी 

Sun, 31 Jul 2016 11:37 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/लखीमपुर खीरी।
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crime - फोटो : amar ujala
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असम की किशोरी को बेचने का मामला..
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सहारा देने के लिए बना सिस्टम ही लापरवाह हो गया
4.4 प्वाइंट था हीमोग्लोबिन, 12 दिन बाद चढ़ाया गया एक यूनिट ब्लड 
फिर नहीं हुई जांच न ही भर्ती कराया, अभी तक अल्ट्रासाउंड भी नहीं हुआ

होना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ
जीआरपी या समिति को ह्यूमन ट्रैफिकिंग और पाक्सो एक्ट में दर्ज करानी चाहिए थी नामजद रिपोर्ट
समिति को डीएम और एसपी को देनी चाहिए थी जानकारी 
सीओ स्तर की महिला पुलिस अधिकारी की तैनाती
किशोरी को मिलना चाहिए था वकील, कराने चाहिए थे बयान
मेडिकल जांच कराकर कराना चाहिए था इलाज 
घरवालों को सूचना देना और आरोपियों की गिरफ्तारी 

16 दिन से किशोरी मानसी स्वाधार गृह में है। चेहरे पर सूजन है। एक यूनिट खून चढ़ाने के बाद भी हीमोग्लोबिन महज 5.5 प्वाइंट ही हुआ है लेकिन किशोरी की फिक्र करने वाले बेफिक्र हैं। किशोरी की यह कहानी सिस्टम की संवेदनहीनता की मिसाल हो गई है। इतने गंभीर मामले में पुलिस, प्रशासन, बाल कल्याण समिति सभी की भूमिका ऐसी रही कि सवाल उठना लाजिमी है। 
स्टेशन पर बरामद होने के बाद किशोरी के बयान पर जीआरपी को ही रिपोर्ट दर्ज करना चाहिए लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। जीआरपी ने चाइल्ड लाइन को किशोरी सौंपी दी, जहां से बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष को जानकारी देकर किशोरी को मानसी स्वाधार गृह भेज दिया गया। बाल कल्याण समिति को इसकी जानकारी डीएम और एसपी को देकर मानव तस्करी और पाक्सो एक्ट में रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए थी। किशोरी के इलाज का प्रबंध कराना चाहिए था लेकिन समिति ने कुछ भी नहीं किया। 16 दिन बाद भी रिपोर्ट और नियमों के तहत कार्रवाई न करने के सवाल को बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष टाल गए और कहा कि लड़की को इंसाफ दिलाएंगे। उधर, स्वाधार गृह की काउंसलर मानसी चौधरी ने बताया कि उन्होंने किशोरी की अब तक पांच बार काउंसिलिंग की है। पहले दिन तो वह कुछ भी नहीं बता पा रही थी। अब उसके मां-बाप और गांव का पता चल पाया है। हालांकि वह अभी भी सहमी हुई है और अपनी पूरी कहानी नहीं बता पा रही है।
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हीमोग्लोबिन 4.4 फिर भी भर्ती नहीं
किशोरी के स्वास्थ्य को लेकर भी सिस्टम संवेदनहीन रहा। स्वाधार गृह में आने के कई दिन बाद उसका चेकअप कराया गया। हीमोग्लोबिन 4.4 निकलने पर 28 जुलाई को महज एक यूनिट ब्लड चढ़ाया गया। 29 जुलाई को परीक्षण में हीमोग्लोबिन 5.5 आया। तकनीकी कारणों से पहली कोशिश बेकार होने के बाद उसका दुबारा अल्ट्रासाउंड नहीं कराया गया। खून में इतनी कमी होने के बाद आमतौर पर मरीज को भर्ती कराकर ब्लड चढ़ाया जाता है। चाइल्ड लाइन की सदस्य रजनी मिश्रा का कहना है कि किशोरी को जिला अस्पताल के फिजीशियन डॉ. आरएस मधौरिया को दिखाया गया। खून की कमी होने पर ब्लड चढ़ाया गया। अभी उसका इलाज चल रहा है। वहीं, डॉ. मधौरिया का कहना है कि किशोरी को कोई विशेष समस्या नहीं है। उसे नियमित खाना-पानी नहीं मिला। वह खानपान से ही ठीक हो जाएगी। एक सप्ताह की दवाई दी गई है।

एचटीयू सेल पर ताला, प्रभारी छुट्टी पर
लड़की की खरीदफरोख्त की जानकारी पर एन्टी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (एएचटीयू) को कार्रवाई करनी चाहिए थी लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। एचटीयू आफिस पर ताला लटक रहा है और वहां कोई भी देखने वाला नहीं है। प्रभारी भी छुट्टी पर हैं। दिलचस्प यह है कि इस वर्ष अभी तक इस यूनिट में मानव तस्करी का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ है। सेल प्रभारी राजेश सिंह से शनिवार को उनके मोबाइल पर बात हुई तो उन्होंने बताया कि वह लंबी छुट्टी पर गए थे। उन्हें घटना की जानकारी नहीं है। अब वापस लौट रहे हैं, रविवार को मिलेंगे। जब रविवार को उन्हें फोन मिलाया गया तो वह काफी देर तक स्विच आफ मिलता रहा।

लड़की अपने घर के पते सहित कुछ भी नहीं बता पा रही थी। न ही उसने कोई आरोप लगाया इसलिए प्राथमिक मेडिकल परीक्षण कराकर उसे चाइल्ड लाइन के सुपुर्द कर दिया गया था।
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- मानवेंद्र पाठक, एसओ जीआरपी 

18 साल से कम आयु के बच्चों के मिलने पर समिति कार्रवाई कराती है। इस मामले में भी कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज कराई जाएगी। लड़की को इंसाफ दिलवाएंगे और उसके परिवारवालों से मिलवाएंगे। 
- चंद्र किशोर मौर्य, अध्यक्ष बाल कल्याण समिति 
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