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खबरें मिलने के बाद भी 'बेखबर' बने रहे नेपाल सीमा के पहरेदार

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लखीमपुर खीरी। भारत-नेपाल सीमा पर टेरर फंडिंग के इनपुट सीमा की निगरानी में लगीं सुरक्षा एजेंसियों को लगातार स्थानीय लोगों से मिले थे, मगर सुरक्षा एजेंसियों ने इसे सामान्य प्रक्रिया बताकर पल्ला झाड़ लिया था। कारण यह था कि इस काम में लगे लोग मुखबिर की तरह पुलिस और इन सुरक्षा एजेंसियों को दूसरे लोगों द्वारा की जा रही तस्करी की छोटी-छोटी जानकारियां देकर उन्हें पकड़वाकर अपने ऊपर हाथ रखवाए रहते थे। लोगों का कहना है कि सुरक्षा एजेंसियां यदि इनपुट पर गौर कर तहकीकात करतीं तो शायद देश विरोधी ताकतों की जड़ें तराई में नहीं जम पातीं या कम से कम पहले ही खुलासा हो जाता।
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नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में देश विरोधी ताकतों के बारे में पता लगाने के लिए ‘सीमा जागरण मंच’ सीमावर्ती गांवों में जन जागरुकता अभियान चलाता हैं। साथ ही गांवों में बैठक कर सीमा पर होने वाली गतिविधियों की जानकारी भी जुटाता है। अमर उजाला ने इस संगठन के जिला संयोजक विनय जायसवाल, जिला युवा प्रमुख डॉ. सुनील सत्यार्थ और खंड उपाध्यक्ष रमाशंकर पांडेय से अलग-अलग बातचीत की। तीनों पदाधिकारियों का कहना था कि टेरर फंडिंग के मामले में गिरफ्तार अभियुक्त स्थानीय पुलिस और सीमा से जुड़ी अन्य सुरक्षा एजेंसियों के संपर्क में थे। वे सुरक्षा एजेंसियों को छोटी-मोटी तस्करी की सूचनाएं देकर उन्हें पकड़वाते थे। बाद में स्वंय उसका निपटारा करवा देते थे। इन्हीं संबंधों का लाभ उठाकर देश विरोधी कृत्यों को अंजाम देते थे। यह एजेंसियां जब तक ऊपर से दबाव न पड़े तब तक इन कार्यों के प्रति अंजान रहती हैं। कोई आवाज उठाता है तो उसे संबंधित को बता देते हैं या फिर उसकी आवाज को दबा देते हैं। तीनों पदाधिकारियों ने बताया कि टेरर फंडिंग की करीब तीन महीने पहले सीमा जागरण मंच को बैठकों के दौरान जानकारी हुई थी। उन्होंने इसकी जानकारी स्थानीय एसएसबी की खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों को खुद दी थी। उस समय अफसरों ने यह कहकर अनसुना कर दिया था -‘दोनों देशों के सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग बाजार आते -जाते ही हैं। व्यापारिक दृष्टिकोण से थोड़े-बहुत रुपये एक्सचेंज करते हैं। इसमें कोई ऐसा अपराध नहीं है।’ टेरर फंडिग गिरोह के लोग इसी व्यापार की आड़ में बड़े पैमाने पर देशी विरोधी इस कृत्य को अंजाम देते रहे और उनकी सीमावर्ती क्षेत्रों में जड़े जमती चली गईं।
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