फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गायब हो रहे काग, कौन पहुंचाए पितरों को भाग

Fri, 02 Oct 2015 07:47 PM IST
लखीमपुर खीरी
विज्ञापन
विज्ञापन
पितृ पक्ष में श्राद्ध के दौरान गाय, कुत्ता और कौए का भाग निकालने की परंपरा आदि काल से चली आ रही है लेकिन अब घर की अटारी पर कौए मुश्किल से ही दिखते हैं। लोग चिंतित हैं कौए गायब हो रहे हैं ऐसे में उनके पितरों को भाग कौन पहुंचाएगा। बात अंधविश्वास की भले ही लगती हो लेकिन इसके पीछे असल कारण पशु पक्षियों के पोषण की भावना है, ताकि पर्यावरण का संतुलन बना रहे।
विज्ञापन

कौआ भले ही देखने में अप्रिय लगे लेकिन पर्यावरण के संतुलन में उसका विशेष महत्व है। कौआ प्रकृति में गिद्ध के बाद दूसरी श्रेणी का सफाई कर्मी माना जाता है। वह न केवल हानिकारक कीड़े मकोड़ों को खाता है बल्कि मृत पशुओं के अपशिष्ट को खा लेता है। कौआ शाकाहारी और मांसाहारी दोनों है। उसको दूरदर्शी भी कहा जाता है। पिछले दो दशक में इनकी संख्या में काफी गिरावट आई है। पक्षी वैज्ञानिकों का मानना है कि पिछले दो दशक में इनकी संख्या में करीब 60 फीसदी कमी आई है।
कौओं की संख्या घटने का है ये कारण
-परंपरागत खेती में बदलाव, अनाज का कम बोया जाना
-फसलों में कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग
-बागों और बड़े पेड़ों का लगातार कम होना
-घरों से खाने पीने की चीजें कम मिलना
पितृ पक्ष में ही कौओं की क्यों आती है याद
पितृ पक्ष बरसात के समापन पर होता है। बरसात के मौसम में तमाम हानिकारक कीड़े मकोड़े पैदा हो जाते हैं।  कौए इन कीटों को खाकर नष्ट कर देते हैं। इन दिनों खेतों में अनाज नहीं होता। ऐसे में इनके पोषण की जरूरत होती है। तब लोग धार्मिक भावना से इनका पेट भरते है।   
विज्ञापन

क्या कहते हैं पक्षी विशेषज्ञ
पक्षी विज्ञानी केके मिश्र कहते हैं कि तराई में हाउस क्रो और जंगल क्रो दो प्रजातियों के कौए पाए जाते हैं। कौए का मस्तिष्क काफी विकसित होता है। इसलिए इसे चतुर पक्षी माना जाता है। कौआ प्रकृति का सफाई कर्मी माना जाता है। ये हानिकारक कीड़े मकोड़ों को खा जाता है। कौआ बीजों के विकरण में सबसे सहायक होता है।
पितृ पक्ष में कौए का भाग निकालने का ये है कारण
गोला गोकर्णनाथ के प्रसिद्ध ज्योतिषी पं. रामदेव मिश्र शास्त्री का कहना है कि भारतीय समाज में सभी व्रत और त्योहारों का वैज्ञानिक महत्व है। यहां पेड़ पौधों और पशु पक्षियों की पूजा का विधान है। इसके पीछे पर्यावरण संतुलन बनाए रखना प्रमुख मकसद है। इसी क्रम में पितृ पक्ष में कौए को कौर देने की परंपरा भी शामिल है। पुराणों में कौए को त्रिकालदर्शी कहा गया है।  
विज्ञापन


विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें