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बोतलों में दफन हो गया तीन सौ मौतों का राज

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लखीमपुर खीरी। दस साल में जिले में 814 से अधिक लोगों की मौत का राज बोतलों में कैद है। इनमें से पोस्टमार्टम हाउस के कमरे में बंद तीन सौ से अधिक विसरा नष्ट हो चुके हैं। अब जांच के लिए भेजने लायक भी नहीं बचे हैं। इनकी मौत की हकीकत जानने की पुलिस ने कोशिश नहीं की। कई लावारिस लोगों की मौतों का राज विसरा खराब होने से बोतलों में दफन हो गया।
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30 अगस्त 2019 को शहर के मोहल्ला आनंदनगर निवासी वकील गगन कुमार शुक्ला का शव उल्ल नदी में मिला था। मौत की वजह साफ न होने पर डॉक्टर ने विसरा सुरक्षित कर पुलिस को सौंपा। चार महीने पहले मोहल्ला नौरंगाबाद निवासी श्वेता सिंह की मौत का कारण स्पष्ट न होने पर विसरा सुरक्षित। यह केस सिर्फ बानगी है। पोस्टमार्टम हाउस में रखे तीन सौ से अधिक विसरा दस साल से अधिक पुराने हैं। अभी इन लोगों की मौत का राज फाश नहीं हुआ है। किस कारण इन लोगों की मौत हुई इस बारे में न तो उनके घर वालों को पता चला है और न ही पुलिस ने जानने की कोशिश की है। यह विसरा अब जांच लायक भी नहीं बचे हैं। कुछ को चूहों ने कुतर डाला तो कुछ खराब हो गए। पांच सालों में 413 विसरा सुरक्षित कर पुलिस को सौंपे गए। इनमें से करीब 323 विसरा जांच के लिए अब तक लैब नहीं भेजे गए। जो भेजे गए उनमें से अभी तक 24 की ही परीक्षण रिपोर्ट आई है। थानों पर विसरा-कमरों और दरवाजों पर इधर-उधर लटक रहे हैं। अधिकांश अज्ञात लाशों में पुलिस विसरा को परीक्षण के लिए नहीं भेजती।
क्या है विसरा
मृतक के लीवर का टुकड़ा
किडनी
स्पलीन (तिल्ली)
स्टॉमक (खाने की थैली)
छोटी आंत का टुकड़ा
ऐसा रखा जाता है विसरा
विसरा के लिए मृतक के शरीर से लीवर का टुकड़ा आदि सभी अंग निकाल कर सुरक्षित रखे जाते हैं। कांच की बोतल में दवाई के घोल में रखे जाते हैं। जिन्हें पुलिस जांच के लिए भेजती है। इन अंगों की जांच से मृतक की मौत का कारण स्पष्ट होने में काफी हद तक मदद मिलती है।
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90 दिन बाद हो जाता है खराब
विसरा 90 दिन तक ही सुरक्षित रहता है। उसके बाद वह खराब हो जाता है। यानी 90 दिन के अंदर अगर जांच के लिए उसे फोरेंसिक लैब भेज दिया गया और वहां जांच हो गई तब ठीक है वरना इसका कोई तलब नहीं रह जाता।
हाई प्रोफाइल मामलों में ही हो पाती है जांच
विसरा जांच पूरी तरह से विवेचक पर निर्भर करता है। हाईप्रोफाइल मुकदमा जिसमें अफसरों की नजर होती है। उसमें विसरा समय से जांच के लिए भेज दिया जाता है। सामान्य मामले में विसरा उसी तरह से पड़ा रहता है। जब तक मुकदमा का निर्णय न आ जाए।
प्रदेश में हैं सिर्फ हैं दो लैब
विसरा परीक्षण के लिए उत्तर प्रदेश में लखनऊ और आगरा में विधि विज्ञान प्रयोगशाला है। प्रदेश भर से विसरा जांच के लिए जाते है। इस वजह से विसरा परीक्षण में रिपोर्ट आने से छह से साल भर लग जाता है।
2016 से पुलिस को सौंपते हैं विसरा
डॉक्टरों के मुताबिक वर्ष 2016 से सुरक्षित किए गए विसरा पोस्टमार्टम हाउस स्थित कक्ष में नहीं रखे जाते। अब विसरा संबंधित थाने की पुलिस को सुरक्षित कर सौंप दिया जाता है। जिसे विवेचक विधि विज्ञान प्रयोगशाला जांच के लिए भेजता है।
अभियोजन का केस होता है कमजोर
विसरा रिपोर्ट न होने पर अभियोजन का केस कमजोर होगा। जिसका सीधा लाभ आरोपित पक्ष को मिलता है। कभी-कभी पुलिस बिना विसरा परीक्षण रिपोर्ट के चार्जशीट और फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर देती है।
-राजीव पांडेय एडवोकेट फौजदारी।
परीक्षण के लिए विसरा पुलिस लखनऊ भेजती है। जांच रिपोर्ट आने के बाद उसे विभागीय अधिकारियों की अनुमति मिलने पर उसे नष्ट कर दिया जाता है। गैर जरूरी रखे विसरा को नष्ट करने के लिए सीएमओ को रिपोर्ट दी जाएगी।
-रोहित पाठक, प्रभारी पुलिस चिकित्सालय लखीमपुर खीरी
पोस्टमार्टम में संदिग्ध हालात होने पर विसरा सुरक्षित किया जाता है। जिन मामलों में जरूरत होती है। उसकी जांच कराकर रिपोर्ट ली जाती है। विधि विज्ञान प्रयोगशाला से रिपोर्ट आने में कभी-कभी देरी हो जाती है। जो विसरा रखे हैं, उनकी जानकारी लेकर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
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-पूनम, पुलिस अधीक्षक
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