लखीमपुर खीरी। अश्विन अधिमास होने के कारण इस बार शारदीय नवरात्र एक महीने देर से 16 अक्तूबर को शुरू होंगे। इसके साथ अश्विन मास में दो कृष्ण पक्ष और दो ही शुक्ल पक्ष होंगे। ज्योतिषार्यों के अनुसार प्रथम कृष्ण पक्ष को शुद्ध अश्विन कृष्ण पक्ष यानी श्राद्ध पक्ष कहा जाएगा जो दो सितंबर से शुरू होकर 17 सितंबर तक रहेगा। 18 सितंबर से अधिमास शुक्ल पक्ष होगा जो एक अक्तूबर तक रहेगा। बताया जा रहा है कि यह स्थिति 165 साल बाद होने जा रही है। इसी कारण जो चातुर्मास चार महीने का होता है, वह इस बार पांच महीने का होगा। अधिमास के कारण ही दशहरा 26 अक्तूबर और दिवाली 14 नवंबर को मनाई जाएगी।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार चंद्रमा मास 27 दिन और सूर्य मास तीस दिन का होता है। एक सूर्य वर्ष 365 दिन और छह घंटे और चंद्रमा का एक वर्ष 354 दिन का होता है। दोनों के बीच 11 दिनों का यह अंतर हर तीन साल में लगभग एक महीने के बराबर होता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्रमास अतिरिक्त आता है। इसी कारण इसे अधिमास का नाम दिया गया है। इसे मलमास भी कहते हैं जिसमें तालाब बनवाना, मंदिरों में प्राण प्रतिष्ठा, राज्यभिषेक, विवाह, मुंडन, कर्ण छेदन जैसे शुभ कार्य वर्जित होते हैं। अधिमास बीतने पर शुद्ध अश्विन शुक्ल पक्ष 17 अक्तूबर से शारदीय नवरात्र शुरू होंगे जिसमें अभिजीत मुहूर्त सुबह 11.37 से 12.23 तक रहेगा। 24 अक्तूबर से अतिरिक्त मास में अन्नपूर्णा परिक्रमा रहेगी। दुर्गा विसर्जन 26 अक्तूबर सोमवार को होगा।
पौराणिक मान्यता: मलमास में पूजन नहीं चाहते देवता
मान्यता है कि मलमास में कोई भी देवता अपनी पूजा कराना नहीं चाहते थे और इस महीने के देवता भी नहीं बनना चाहते थे। मलमास ने भगवान विष्णु से स्वीकार करने का निवेदन किया तभी से मलमास को पुरुषोत्तम मास का भी नाम दिया गया। इस महीने में भागवत कथा और प्रवचन सुनने का विशेष महत्व माना गया है। यह भी कहा जाता है कि इस मास में दानपुण्य करने से मोक्ष के द्वार खुलते हैं।
श्राद्ध समाप्त होने के एक माह बाद शरदीय नवरात्र शुरू होंगे। इस बार ऐसा एक माह के मलमास के कारण हो रहा है।
पंडित पंकज कृष्ण शास्त्री, मुड़िया महंत मंदिर
पूर्वजों की अपनों से पुकार..हे परिजनों! हमें मुक्ति दिला दो.. बस हमारे फूल सिरा दो
लखीमपुर खीरी। पितृपक्ष दो सितंबर से शुरू हो रहे हैं। 15 दिवसीय पितृपक्ष का समापन 17 सितंबर को होगा। सनातन धर्म के अनुसार इन 15 दिनों में पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है। हालांकि अधिकतर लोग ऐसा करते भी हैं। मगर, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनों का दाह संस्कार करने के बाद उनके फूल (अस्थियां) गंगा में प्रवाहित करना ही भूल गए। इससे शहर के मुक्तिधाम सेठघाट के अस्थि कक्ष में 150 से अधिक अस्थि कलश इकट्ठा हो गए हैं। वहीं करीब 50 से अधिक अस्थि कलश पिंडदान भवन में भी अपनों का इंतजार कर रहे हैं कि एक न एक दिन उनके बेटे-बेटियां या फिर कोई अपना अस्थियां वहां से ले जाकर गंगा में प्रवाहित कर उन्हें मुक्ति दिला देगा। सेठघाट के पुजारी पंडित अशोक कुमार का कहना है हर माह करीब 70 दाह संस्कार होते हैं। एक साल में करीब 700 अंतिम संस्कार हुए, जिसमें से कई लोग कुछ दिन बाद ही आकर अस्थियां ले गए और उन्हें पवित्र नदियों में प्रवाहित कर दिया। मगर, बहुत से लोग बाद में विसर्जन करने की बात कहकर पूर्वजों के फूलों को अस्थि कक्ष में रखकर चले गए और आज तक वापस नहीं आए।
श्राद्ध करने से ही पितरों को मिलती है मुक्ति
देवकली तीर्थ के आचार्य पंडित प्रमोद दीक्षित बताते हैं कि पितृपक्ष में पूर्वजों का पिंडदान और तर्पण कर उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, क्योंकि पितरों की नाराजगी से व्यक्ति का जीवन प्रभावित हो जाता है। इससे घर में अशांति रहती है और व्यापार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा: श्राद्ध के दिन घर में जो बड़ा हो वह जल्दी उठे। दैनिक कर्म से निवृत्त होकर पितरों को जौ, तिल और जल से तर्पण कर पिंडदान करें। इसके बाद श्रद्धानुसार ब्राह्मणों को भोज कराकर दान दक्षिणा देकर विदा करें।
लॉकडाउन के कारण विसर्जित नहीं हो सकीं अस्थियां
सेठघाट मुक्तिधाम के पंडित अशोक कुमार बताते हैं कि दाहसंस्कार के दो तीन दिन बाद ही अस्थियां गंगा में प्रवाहित हो जानी चाहिए। मगर, यदि समय का अभाव है तो एक दो माह में भी विसर्जित कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि अंतिम संस्कार करने के दो चार दिन तक जब कोई अस्थियां बीनने नहीं आता है तो वह स्वयं उनके फूल अस्थि संग्रह कक्ष में सुरक्षित रखवा देते हैं, जिससे अपनों के आने पर उन्हें सौंपा जा सके। पंडित अशोक कुमार बताते हैं कि तीन चार माह बीत जाने पर जिला प्रशासन की अनुमति से अस्थियों को गंगा में प्रवाहित करा दिया जाता है। उन्होंने बताया कि इस बार लॉकडाउन के कारण अस्थियों को विसर्जित नहीं कराया जा सका है।
गोला में भी अपनों के इंतजार में मुक्तिधाम में रखे अस्थि कलश
गोला गोकर्णनाथ। भगवान श्री राम के पूर्वज महाराजा भगीरथ ने त्रेता युग में कपिल मुनि के श्राप से भस्म हुए अपने 60 हजार पूर्वजों के मोक्ष के लिए कठोर तपस्या कर गंगा मां को धरती पर उतारा था। मां गंगा के स्पर्श से उनके पूर्वजों का उद्धार हुआ। मगर, नगर के मुक्तिधाम में रखे करीब 250 अस्थि कलश कई साल से विसर्जन के लिए अपने भगीरथ का इंतजार कर रहे हैं।
2013 में कमेटी ने कराया था विसर्जन
वर्ष 2013 में मुक्तिधाम समिति के लोगों ने फर्रुखाबाद जाकर करीब 400 अस्थि कलश गंगा जी में विसर्जित किए थे। अब फिर से काफी संख्या में अस्थि कलश इकट्ठे हो चुके हैं।
एक पखवाड़े तक अस्थि कलश रखने का है नियम
मुक्तिधाम समिति अध्यक्ष पवन कुमार साहनी बताते हैं कि श्मशान में एक पखवाड़े तक अस्थि कलश रखने का नियम है। फिर भी लोग सालों तक अस्थियां नहीं ले जाते। इस पर समिति अस्थियों को गंगा में प्रवाहित करवाती है।
पितृ पक्ष में वंशज अपने पूर्वजों का करें तर्पण
ज्योतिषाचार्य पंडित रामदेव मिश्र शास्त्री ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन माह की पितृ विसर्जन अमावस्या तक का समय पितृपक्ष कहलाता है। पूर्वजों को श्रद्धा भाव अर्पित करने का यह महापर्व प्रारंभ होने जा रहा है। पितृपक्ष के मध्य हमारे पूर्वज पितरलोक से धरती पर अपने प्रियजनों के पास आते हैं। ऐसे में पितृ पक्ष पर उनके प्रति सम्मान और आदरभाव दिखाने के लिए उन्हें तर्पण दिया जाता है।
मान्यता है कि पितृपक्ष पर श्राद्ध कर्म और पिण्ड दान कर्म करने पर पितृदोष से मुक्ति मिल जाती है। पितृपक्ष में जब पितरदेव धरती पर आते हैं उन्हें प्रसन्न करके पुन: पितरलोक में विदा किया जाता है। श्राद्ध के दिन तर्पण करना बहुत जरूरी है। तर्पण मध्याह्नकाल 11 से 12 बजे के बीच में करना चाहिए। अक्षत से देवताओं को, जौ से ऋषियों को एवं काले तिल से पितरों को गंगाजल और तुलसी लेकर ताम्रपत्र में तांबे के लोटे में जल लेकर तर्पण करना चाहिए। इस दिन पितरों की पसंद का भोजन बनवाना चाहिए। गाय, कौआ और कुत्ता के लिए ग्रास निकालना चाहिए। इसके अलावा ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान, दक्षिणा देनी चाहिए अथवा किसी ब्राह्मण को इस दिन तिल, स्वर्ण, घी, वस्त्र, गुड़, चांदी, पैसा, नमक और फल का दान करना चाहिए।
कब करें श्राद्ध
-जिन पितरों के देहावसान की तारीख नहीं पता उनका तर्पण आश्विन अमावस्या को
-किसी पितृ की अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका तर्पण चतुर्दशी तिथि को
-पिता का श्राद्ध, जिनकी तिथि मालूम नहीं अष्टमी को
-माता का श्राद्ध, जिनकी तिथि मालूम नहीं नवमी तिथि को