बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। बाघों के साथ दूसरे वन्यजीवों के संरक्षण और संवर्धन को लेकर वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की एक विशेष कार्यशाला का आयोजन दिल्ली में किया गया। जिसमें मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती घटनाओं के दौरान आ रहीं चुनौतियों से निपटने पर खासतौर से चर्चा की गई। इस कार्यशाला में देश के सभी राज्यों के वन्यजीव प्रतिपालक के अलावा सभी टाइगर रिजर्व और नेशनल पार्क के फील्ड डायरेक्टर ने हिस्सा लिया।
दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर संजय पाठक ने कार्यशाला से लौटकर बताया कि इस विशेष कार्यशाला में बाघों के संरक्षण और संवर्धन के लिए जंगल की खाद्य शृंखला को मजबूत करने पर बल दिया गया। इसके लिए ग्रासलैंड और वेटलैंड मैनेजमेंट के वैज्ञानिक तरीकों पर चर्चा की गई। चर्चा में यह बात सामने आई कि घास के मैदान और जलाशयों के उचित प्रबंधन से वन्यजीवों की संख्या में इजाफा हो सकता है। इससे बाघों और दूसरे वन्यजीवों को जंगल से बाहर निकलने का खतरा भी कम होगा।
डीटीआर के एफडी ने बताया कि विज्ञान भवन में आयोजित कार्यशाला में महानिदेशक एवं विशेष सचिव (वन) सिद्धांत दास, अतिरिक्त एडीजी एवं सदस्य सचिव नेशनल टाइगर कंजरवेशन सोसायटी (एनटीसीए) डॉ अनूप कुमार नायक, वित्त सलाहकार प्रवीण गर्ग ने जंगल से निकलकर बाघों के गन्ने के खेतों में बसेरा बनाए जाने की स्थिति पर चिंता जताई। कहा गया कि ऐसे प्रयास किए जाएं कि जिससे वन्यजीव जंगल में ही सीमित रहें। तराई क्षेत्र में खासतौर पर पीलीभीत टाइगर रिजर्व में बढ़ते मानव-बाघ संघर्ष पर भी विस्तार से चर्चा की गई। कहा गया कि गन्ने के खेतों में रहने वाले बाघ ही इस समस्या की जड़ हैं। इस स्थिति से पैदा होने के कारणों का अध्ययन करने और उसी के अनुसार उपाय खोजने पर बल दिया गया। कार्यशाला में भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून, जुलोजिकल सोसायटी आफ लंदन के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) के एफडी राजामोहन भी मौजूद रहे।