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Lakhimpur Kheri News: निमोनिया की चपेट में बच्चे, सांस लेने में हो रही दिक्कत

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जिला अस्पताल के पर्चा काउंंटर पर लगी मरीजों की भीड़
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लखीमपुर खीरी। मौसम में बदलाव होने से बच्चों को वायरल बुखार के साथ निमोनिया भी अपनी चपेट में ले रहा है। गंभीर हालत में बच्चों को भर्ती कर इलाज किया जा रहा है। दो दिन पहले एक आठ माह के मासूम की निमोनिया की चपेट में आने से मौत भी हो चुकी है। बच्चों के फेफड़ों में कफ जम जाने से उन्हें सांस लेने में समस्या हो रही है।
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अभी तक बुखार मुसीबत बना हुआ था, लेकिन अब निमोनिया भी मुश्किलें खड़ी कर रहा है। इससे पीड़ित बच्चे महिला और जिला अस्पताल पहुंच रहे हैं। सोमवार को जिला अस्पताल में 1900 और महिला अस्पताल में करीब 450 पर्चे बने। दोनों अस्पतालों की बाल रोग विशेषज्ञ की ओपीडी में तमाम ऐसे बच्चे पहुंचे, जो निमोनिया से पीड़ित थे। इनकी सांसें तेज चल रही थीं। सांस लेने पर आवाज आ रही थी। शनिवार को जिला अस्पताल के बच्चा वार्ड में सीतापुर जिले के गांव सुल्तानपुर निवासी धनीराम के आठ माह के बच्चे की इलाज के दौरान मौत तक हो चुकी है।
बाल रोग विशेषज्ञ ने बताया कि मौसम में बदलाव की वजह से बच्चों को बीमारियां जकड़ रही हैं। निमोनिया की वजह से बच्चों की पसलियां चल रही हैं। फेफड़ों में कफ जम जाने से सांस लेने में दिक्कत होती है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. आरपी वर्मा बताते हैं कि निमोनिया की चपेट में चार- पांच साल तक की उम्र के बच्चे ज्यादा आते हैं। गले में खराश, खांसी, बुखार, दस्त, भूख कम लगना इसके लक्षण हैं।
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तेज बुखार, पसीना आना या ठंड लगना, नाखूनों या होठों का नीला पड़ना, सीने से घरघराहट की आवाज होना, सांस लेने में दिक्कत महसूस करना गंभीर लक्षण हैं। इस तरह की समस्या लगने पर बच्चे को अस्पताल लाकर दिखाएं।

जिला अस्पताल
पर्चे बने-1900
बाल रोग विशेषज्ञ की ओपीडी में देखे गए मरीज- 190
बच्चा वार्ड में भर्ती बच्चे-21
निमोनिया पीड़ित- दो
आईसीयू वार्ड में भर्ती बच्चे- तीन


बचाव के तरीके
1. बच्चों को पूरे कपड़े पहनाकर रखें।
2. कूलर, एसी का बच्चों को परहेज कराएं।
3. गर्मी होने पर हल्का पंखा चलाएं।
4. बच्चों को ठंडी खाद्य सामग्री व पेय न दें।
5. बच्चों को संतुलित और पौष्टिक भोजन दें।


बच्चों के लिए खतरा है निमोनिया
छोटे बच्चों के लिए निमोनिया सबसे बड़ा खतरा होता है। इन दिनों मौसम परिवर्तन चल रहा है, जिसमें निमोनिया से ग्रस्त बच्चों की संख्या भी बढ़ने लगी है। खान-पान से लेकर छोटे बच्चों के रख रखाव में कोताही न बरतें और समस्या होने पर बच्चों को स्वयं कोई दवा न दें।
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-डॉ. आरपी वर्मा, बाल रोग विशेषज्ञ

जिला अस्पताल के पर्चा काउंंटर पर लगी मरीजों की भीड़

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