गोला गोकर्णनाथ। जिले में हॉकी खेल अब सिर्फ गोला में ही बचा है, लेकिन यहां भी इस खेल का अस्तित्व संकट में आ गया है। कभी हॉकी की चार टीमें हुई करती थीं। वर्तमान में हॉकी प्रशिक्षक कोच और संसाधनों के अभाव से जूझ रही है। हॉकी के पूर्व खिलाड़ी कहते हैं कि खिलाड़ियों को बिना किसी कोच के अपने बलबूते प्रतिभा में निखार लाना संभव नहीं।
पूर्व खिलाड़ी बताते हैं कि एक वक्त ऐसा था जब गोला में हॉकी की चार-चार टीमें हुआ करती थीं। कृषक समाज इंटर कॉलेज के खेल शिक्षक एवं 1978 से 1985 तक हॉकी के जाने-माने खिलाड़ी रहे श्याम मूर्ति शुक्ल ने बताया कि सभी माध्यमिक विद्यालयों में हर प्रकार का खेल स्कूल गेम ऑफ इंडिया के कैलेंडर के अनुसार प्रदेश भर में आयोजित होते हैं।
1995-96 में उधमसिंह नगर, उत्तराखंड में हुई सीनियर स्कूल चैंपियनशिप में लखनऊ की टीम में गोला से सात खिलाड़ियों ने प्रतिनिधित्व कर चैंपियनशिप जीती थी। इसके वह स्वयं कोच थे। जेएन मिश्रा मैनेजर, ओलंपियन देवेश सिंह चौहान और नगर के जहरुद्दीन ने गोल कीपिंग की थी। नगर के खिलाड़ी महफूज अली आशु, तनवीर नियामत, राजऋषि शुक्ल, आलोक कुमार, जहरउद्दीन टीम का हिस्सा थे। विश्वनाथ सिंह चयनकर्ता थे। आज नगर में हॉकी की दशा चिंतनीय है।
हॉकी के संसाधन जुटाना आसान नहीं
खेल शिक्षक श्याम मूर्ति शुक्ल ने बताया कि हॉकी की एक सामान्य किट लगभग 10 हजार, गोलकीपिंग किट 30 हजार और टूर्नामेंट के लिए गोलकीपिंग किट करीब 40 से 50 हजार रुपये में आती है। एक सामान्य खिलाड़ी के लिए हॉकी की किट जुटा पाना आसान बात नहीं है। हालांकि कॉलेज की हॉकी टीम है। दो टीमों के 32 खिलाड़ियों के लिए पर्याप्त व्यवस्था भी है।
हॉकी की प्रगति में सरकारें रहीं उदासीन
हॉकी को लेकर नगर की अपनी पहचान रही है। आज भी प्रतिभाओं की कमी नहीं है। अपार संभावनाएं भी हैं। अफसोस होता है कि राष्ट्रीय खेल होते हुए भी सरकार ने हॉकी को वरीयता और प्राथमिकता नहीं दी। खिलाड़ियों के लिए केवल मैदान की पर्याप्त नहीं है, बल्कि उचित मार्गदर्शन, खेल की बारीकियों को समझने के लिए कोच, संसाधन की जरूरत होती है। - श्याम मूर्ति शुक्ल, खेल शिक्षक कृषक समाज इंटर कॉलेज
जिले में हॉकी की स्थिति अत्यंत दयनीय
गोला के कृषक समाज इंटर कॉलेज में हॉकी बची है। एक दशक से किसी भी स्कूल-कॉलेज की टीम ने राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रतिनिधित्व नहीं किया। खेलकूद अध्यापकों के पद रिक्त हैं, जो हॉकी की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा हैं। वह खुद भी वर्ष 1985 से 2016 तक हॉकी टीम चयनकर्ता व प्रशिक्षक रह चुके हैं। -विश्वनाथ सिंह, पूर्व हॉकी टीम चयनकर्ता एवं प्रशिक्षक
श्याम मूर्ति।