गोला गोकर्णनाथ। श्री हनुमान मंदिर सुहेला में हो रही श्रीराम कथा के छठे दिन व्यास अजयानंद महाराज ने भ्रात प्रेम के उत्कृष्ट उदाहरण श्रीराम और भरत के चित्रकूट में मिलने की कथा सुनाई।
व्यास ने कहा कि भरत नंगे पैर राज-समाज के साथ अपने बड़े भाई राम को मनाने जा रहे हैं। कंटकों से युक्त मार्ग भी उन्हें विचलित नहीं कर पा रहा है। भरत भक्ति के पर्याय और धर्म स्वरूप हैं। वह भक्ति के पुंज हैं। त्याग की प्रतिमूर्ति हैं। भगवान श्रीराम ने अपने अनुज भरत की प्रशंसा करते हुए कहा कि भरत के मन में तो राम बसे हुए हैं और राम के मन में भरत। भरत जी के सभी प्रयास राम को अयोध्या वापस ले जाने के विफल हो जाते हैं।
तब भरत कहते हैं -सीताराम चरण रति मोरे, अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरे। इतिहास में सृष्टि के प्रारंभ से अब तक त्याग का भरत जैसा उदाहरण नहीं मिलता है।
इस मौके पर धर्मेंद्र गिरि मोंटी, विशेष वर्मा, माखन लाल, दिवाकर, प्रेम चंद, सत्यनारायण, रितेश, देवेंद्र अवस्थी, मुनेश, रामशरण, राम प्रकाश शुक्ल, राजेंद्र राठौर, पंकज कुमार, हरित, इंद्रेश कुमार, वेद प्रकाश अग्निहोत्री आदि मौजूद रहे।