अवधी भाषा और साहित्य के वर्तमान परिदृश्य पर दो दिन तक चले मंथन में देश-विदेश के विद्वान इस बात पर एक मत हुए कि अवधी भाषी लोग ही अवधी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। अवधी का प्रयोग करने में हीन भावना अनुभव करते है जबकि इसे बोलने में गर्व होना चाहिए। अवधी सशक्त लोकभाषा है। इसका प्रसार क्षेत्र काफी विस्तृत है। भाषा में मुधरता और वैज्ञानिकता है। इसे दूसरी राजभाषा के रूप में मान्यता मिले तो इसका संवर्धन और बेहतर ढंग से हो सकता है।
भगवानदीन आर्य कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय के स्वर्ण जयंती समारोह मल्हार के तहत अवधी भाषा और साहित्य के वर्तमान परिदृश्य पर उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के सहयोग से हुई अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में कॅलिगम विश्वविद्यालय श्रीलंका के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. उपुल रंजीत हेवावितानमगे मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि श्रीलंका में उनके विश्वविद्यालय में हिंदी में अध्ययन-अध्यापन का काम होता है। इस दौरान डोंगरी, भील आदिवासी, मालद्वीपीय प्रथा, पूर्वी भारतीय लोक कथाओं पर चर्चा की। साथ ही श्रीलंका में अवधी भाषा और अन्य भारतीय भाषाओं की स्थिति पर प्रकाश डाला।
अवधी कहानीकार एवं उपन्यासकार डॉ. विनय दास ने अवधी साहित्य की गद्य परंपरा को बताया। उन्होंने बताया कि काव्य के साथ ही अवधी गद्य की सभी आधुनिक विधाओं निबंध, कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, साक्षात्कार, डायरी सभी अवधी में है। उन्होंने बताया कि अवधी गद्य का प्रारंभ 1807 में ही हो चुका था। इसके बाद 1915 अवधी कहानी का आरंभ माना जा सकता है। नेपाल के डॉ. अब्दुल मोबिन ने भारत और नेपाल में अवधी को संयोजक की संज्ञा दी। डॉ. विदुषी भारद्वाज ने राम चरित मानस में जीवन मूल्यों पर प्रकाश डाला।
प्राचार्या डॉ. निरुपमा अशोक ने कहा कि अवधी भाषा और साहित्य के अध्ययन शोध और रचना संसार के विशद विवेचन की दृष्टि से अवधी अत्यंत समृद्ध भाषा है। अवधी के प्रचार-प्रसार के लिए लोक भाषाओं के अंर्तसंबंध की व्याख्या की आवश्यकता है। उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के निदेशक बृजेश चंद्र ने अवधी के प्रचार प्रसार में जनसंपर्क में लोक की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। हिंदी साहित्यकार डॉ. अरुण त्रिवेदी, एसएसपीजी कॉलेज के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. तिलक सिंह और नेपाल के सच्चिदानंद चौबे ने भी संगोष्ठी में अपने विचार रखे। विषय प्रर्वतन डॉ, शशि प्रभा वाजपेयी ने किया। सचिव शिवचंद सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
अवधी बोलने में गर्व करें
आकाशवाणी लखनऊ के कार्यक्रम अधिकारी डॉ. महेंद्र पाठक ने कहा कि अवधी भाषा बोलने में हीनभावना नहीं बल्कि गर्व की अनुभूति होनी चाहिए। इसे संचार का माध्यम बनना चाहिए क्योंकि अवधी में मधुरता है वैज्ञानिकता है, इसमें भोजपुरी जैसी अश्लीलता नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रतिष्ठित लेखकों की रचनाओं का अवधी में अनुवाद होना चाहिए। फिल्म निर्माताओं को चाहिए कि वे अवधी भाषा में फिल्मों का निर्माण करें।