धौरहरा/ईसानगर। जब देवी देवताओं के मंदिरों की बात आती है तो जेहन में यह बात भी उठती है कि मंदिर है तो मूर्ति रूप में भगवान या मां दुर्गा का वास होगा, लेकिन हम आपको ऐसे मंदिर के बारे में बता रहे हैं जहां मंदिर तो है पर मूर्ति नहीं। बस मां के दो त्रिशूल और और चार खूंटी हैं। अदृश्य रूप में माता आशापुरा देवी का वास है।
ईसानगर स्टेट में बना आशापुरा मंदिर अपने आप में अलौकिक है। यहां मंदिर तो है पर कोई मूर्ति स्थापित नहीं है। राजा रंजीत सिंह के वंशज राजा राजेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि माता आशापुरा देवी हमारी कुल देवी हैं। परदादा स्वर्गीय राजा रंजीत सिंह ने 1833 में मां आशापुरा मंदिर का निर्माण कराया था। यहां माता अदृश्य रूप से वास करती हैं। राजा रंजीत सिंह जब भी किसी युद्ध में जाते थे तो माता आशापुरा देवी की पूजा अर्चना करते हुए बलि प्रदान किया करते थे। माता के आशीर्वाद से वह हमेशा युद्ध में विजयी होकर लौटते थे। यह परंपरा आज भी है हर वर्ष विजय दशमी के दिन माता आशापुरा देवी के समक्ष शस्त्र पूजन होता है और उसके बाद बलि प्रदान की जाती है। ईसानगर स्टेट का यह मंदिर इलाक़े का एक मात्र ऐसा मंदिर है जिसमें कोई मूर्ति नहीं है। इस मंदिर के अंदर दो त्रिशूल और चार खूंटी स्थापित हैं। राजा राजेंद्र प्रताप सिंह के मुताबिक मंदिर निर्माण के बाद पंडित जागेश्वर झा मुख्य पुजारी रहे। उनके बाद, कृष्णदत्त मिश्र, बुधराम अवस्थी, विद्या नंदन झा, जै जै राम मिश्र, विजयकांत झा, वर्तमान में पंडित बाबूराम मिश्र मंदिर में पूजा पाठ सहित मंदिर के रख रखाव की जुम्मेदारी निभा रहे हैं।
रंजीत सिंह के वंशज विजय दशमी में चढ़ाते हैं बकरे की बलिराजा रंजीत सिंह की बलि प्रदान की परंपरा अब भी राजपरिवार निभाता चला आ रहा है। राजा रंजीत सिंह के वंशज राजा राजेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं। कुल रीति के अनुसार विजय दशमी को माता आशापुरा देवी के समक्ष शस्त्र पूजन और बकरे की बलि प्रदान की जाती है। यह परंपरा करीब दो सौ वर्षों से चली आ रही है। हम सभी परिवार के लोग विजय दशमी में माता आशापुरा देवी की पूजा करते हैं।