लखीमपुर खीरी। शहर से परिवहन निगम की रोडवेज बसों का संचालन शुरू कराने के लिए वर्कशॉप का होना जरूरी है। इसके लिए कई माह पहले शासन ने पत्र भेजकर 10 एकड़ भूमि चयनित कर बताने को कहा था, लेकिन जमीन खोजने में जनप्रतिनिधि और प्रशासन असफल साबित रहे। अनदेखी के चलते वर्ष 2006 के बाद से अनुबंधित बसें ही लखीमपुर डिपो से संचालित हो रही हैं, जिनके पहिए शाम सात बजे के बाद थम जाते हैं। इससे यात्रियों को परेशानी होती है।
जनपद में परिवहन निगम के दो डिपो हैं। एक लखीमपुर, दूसरा गोला गोकर्णनाथ में है। गोला रोडवेज के पास वर्कशॉप है और निगम की बसें हैं, जो दिल्ली व अन्य लंबी दूरी के मार्गों पर दौड़ाई जाती हैं। दुर्भाग्य यह है कि जिला मुख्यालय के लखीमपुर डिपो का न तो खुद का वर्कशॉप है और न ही निगम की कोई बसें।
लखीमपुर डिपो के पास मात्र 88 अनुबंधित बसें हैं, जो सीमित मार्गों पर ही संचालित की जातीं हैं। कई ऐसे मार्ग हैं, जिन पर लखीमपुर डिपो की एक भी बस नहीं चलती, जबकि अगर उन रूट पर बसों का चलाया जाए तो रोडवेज को अच्छी आय हो सकती है। अनुबंधित बसें होने की वजह से विभागीय अफसर के पास इसका अधिकार नहीं है।
मथना में मिली जमीन, मगर नहीं हो सकी स्वीकृत
जनपद मुख्यालय पर करीब सात दशक से लखीमपुर डिपो का बस अड्डा है, लेकिन अब तक वर्कशॉप नहीं बन पाया है। ऐसे में निगम की एक भी निगम लखीमपुर डिपो में नहीं है। जिम्मेदार लंबे समय से वर्कशॉप के लिए जमीन तलाश रहे हैं। कई साल पहले शहर से करीब छह किलोमीटर दूर देवकली के पास मथना में पांच एकड़ जमीन मिली थी। उसका प्रस्ताव भी भेजा गया था, लेकिन बाद में उस जमीन की योजना फेल हो गई थी।
इन मार्गों पर एक भी रोडवेज बस नहीं
लखीमपुर में कई ऐसे मार्ग हैं, जहां एक भी रोडवेज बस नहीं चलती। इन मार्गों पर प्राइवेट बसों का कब्जा है। इसमें मैंगलगंज, पलिया, निघासन आदि प्रमुख मार्ग शामिल हैं। अनुबंधित बसें होने की वजह से शाम सात बजे के बाद बसों के पहिया थम जाते हैं। लखनऊ के लिए अंतिम बस रात नौ बजे है। इसके बाद कोई भी बस नहीं है।
वर्कशॉप के लिए 10 एकड़ जमीन की जरूरत है। चुनाव व आचार संहिता की वजह से इस मामले में कोई भी प्रयास नहीं हो सका। आचार संहिता हटते ही जमीन तलाश की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। -मुकेश मेहरोत्रा, एआरएम, लखीमपुर डिपो