लखीमपुर खीरी। आजादी मिलने के कुछ वर्षों बाद ही लोग आजादी की जंग लड़ने वाले क्रांतिकारियों और शहीदों के शौर्य को भूलने लगे। स्वतंत्रता के बाद जिन शहीदों और क्रांतिकारियों के स्मारक बनाए गए थे, वे भी देखरेख के अभाव में जर्जर हालत में पहुंच गए हैं। कुछ का तो वजूद खोने को है।
स्वतंत्रता समर में जिले में अपने प्राणों की अंतिम आहुति देने वाले शहीद राजनरायन का जिला मुख्यालय पर स्थित स्मारक तो सुरक्षित है लेकिन उनके पैतृक गांव भीखमपुर में लगी प्रतिमा के सिर को अभी तक छत भी नसीब नहीं हो पाई है। प्रतिमा के आसपास कूड़े के ढेर और गंदगी शहीद की प्रतिमा की उपेक्षा दर्शाती है। यही नहीं, राष्ट्रीय पर्वों पर भी लोग इस शहीद की प्रतिमा पर फूल चढ़ाना याद नहीं रखते।
जिला मुख्यालय पर बने राजनरायन स्मारक में सीतापुर आंख अस्पताल की शाखा चल रही है। स्मारक के प्रांगण में शहीद राजनरायन मिश्र की प्रतिमा स्थापित है। आजादी के 65 साल बाद तक यह प्रतिमा खुले आसमान के नीचे रही। दो साल पहले नगर पालिका अध्यक्ष डॉ. इरा श्रीवास्तव ने प्रतिमा के ऊपर छत बनाकर इसे सुरक्षित किया। अब तो इस स्मारक के ट्रस्ट का भी अता-पता नहीं रहा। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक राजा लोने सिंह और इंद्र विक्रम सिंह का स्मारक तो दूर उनकी एक अदद तस्वीर तक जिले में उपलब्ध नहीं है।
आजादी के बाद सभी ब्लाक कार्यालयों में क्रांति स्तंभ स्थापित किए थे। इन पर ब्लाक क्षेत्र के शहीदों और स्वाधीनता सेनानियों के नाम सुनहरे अक्षरों में अंकित किए गए थे। इन पर पुष्पांजलि अर्पित करने की परंपरा थी। समय के साथ यह परंपरा लुप्त हो गई। कई स्तंभों की हालत तो इतनी जर्जर है कि उन पर लिखे क्रांतिकारियों के नाम तक मिट गए हैं।
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डल्ला राम की अगुवाई में उखाड़ी गई रेल पटरी
बांकेगंज (ब्यूरो)। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बांकेगंज स्वाधीनता संग्राम सेनानियों का बड़ा केंद्र बन गया था। इस आंदोलन की आग काकोरी, नगरिया, महुरेना, सौंखिया, संसारपुर, कुकहापुर और कुकरा गांवों में भड़क उठी थी। नौ अगस्त 1942 को हजारों लोग बांकेगंज में जुटे थे। डल्ला राम की अगुवाई में सभी ने मिलकर कुकरा-मैलानी जंगल के बीच बिछी रेल लाइन को उखाड़कर फेंक दिया।
ग्राम नगरिया में स्वतंत्रता सेनानी निरंजन लाल की विधवा भगवती देवी अब 90 साल की हैं। बताया, उस दिन डल्ला राम, बाबूराम, रामपाल, मंजूलाल वर्मा, देवीदयाल सक्सेना, कोमल सक्सेना, खूबचंद्र वर्मा समेत सैकड़ों लोगों ने रेल पटरी उखाड़ दी। संसारपुर गांव में अंग्रेजों के बने कोठार का भी इन लोगों ने नामोनिशान मिटा दिया।
खीरी के तत्कालीन अंग्रेज कलक्टर नील ने बढ़ते जनाक्रोश को देखते हुए फौज की एक टुकड़ी बांकेगंज भेज दी। अंग्रेजी फौज ने गांवों में जाकर आंदोलनकारियों के घर खोद डाले। महिलाओं को यातनाएं दीं। दिसंबर 1942 को तमाम आंदोलनकारी गिरफ्तार कर लिए गए। इन्हें नौ अगस्त 1943 को सजा सुनाई गई और बरेली जेल में डाल दिया गया। सेनानी की विधवा ने बताया कि जेल में आपस में बात करने तक पर कोड़ाें की सजा दी जाती थी। 1947 में देश आजाद होने पर वे साथियों के साथ रिहा हुए।