निघासन। इन दिनों लकड़कट्टों ने तराई के जंगलों को अपना निशाना बना रखा है। मंझगईं रेंज के जंगल हो या लुधौरी रेंज के जंगल, चारों तरफ हरियाली उजाड़ी जा रही है। मंझगईं रेंज के नउनिया जंगल में खैर और शीशम के लगे पेड़ों को काटकर मैदान बना दिया गया है। वहां सिर्फ पेड़ों की मुड्ढियां ही नजर आ रहीं हैं।
इंडो नेपाल बार्डर का यह इलाका जंगल से चारों तरफ घिरा हुआ है। इन जंगलों में साखू, सागौन, शीशम, खैर आदि के कीमती पेड़ लगे हुए हैं। इन हरे-भरे पेड़ों को काटकर जंगल के किनारे बसे गांव के लोग डनलप, फर्नीचर बनाने के साथ चूल्हे में जलाने के प्रयोग में ला रहे है। आलम यह है कि बेलरायां के पास दुधवा टाइगर रिजर्व जोन क्षेत्र भी लकड़कट्टों से महफूज नहीं है।
नउनिया जंगल में शीशम की लकड़ी को काट कर ग्रामीण डनलप बना कर 15 से बीस हजार तक बेचने का काम करते हैं। इसके अलावा खैर की लकड़ी से कत्था निकाल कर निघासन और सिंगाही क्षेत्र में बडे़ पैमाने पर बिक्री के लिए जाता है। आलम यह है कि बंजरिया का आधा जंगल पेड़ विहीन हो गया है। लकड़कट्टे बिना रोक-टोक लकड़ी काटते देखे जा सकते है। मुंशीगढ़ में चोरी से पेड़ काटने गए अशफाक की मौत के बाद भी प्रशासन की नींद नहीं टूटी है।
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यह सच है कि जंगल में चोरी से लकड़ी काटी जा रही है। मैं खुद इन लकड़कट्टों को रंगे हाथ पकड़कर कार्रवाई करूंगा।
-राधेश्याम, रेंजर मझगईं