दुधवा नेशनल पार्क न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का नजारा पेश करता है, बल्कि जंगल में रहने और घूमने का रोमांच भी देता है। यही नहीं यह सैलानियों को बहुत कुछ सीखने और प्रकृति के साथ जुड़ने का मौका भी देता है। यही कारण है कि दुधवा नेशनल पार्क में साल दर साल देशी, विदेशी सैलानियों की तादाद बढ़ रही है। इसे देखते हुए पार्क प्रशासन ने पिछले कुछ वर्षों में सैलानियों को स्तरीय सुख सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में काफी काम किया है।
दुधवा नेशनल पार्क का अलौकिक वातावरण और प्राकृतिक सौंदर्य सैलानियों को खूब भा रहा है। यहां दुधवा नेशनल पार्क में स्वच्छंद विचरण करते गैंडा, हाथी और बाघ के दर्शन के लिए सैलानी लालायित रहते हैं। जंगल के घास के मैदानों में कुलाचे भरते हिरनों के झुंड देख सैलानी रोमांचित होते हैं। बारासिंहा हिरनों के संरक्षण को दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना वर्ष 1977 में की गई थी।
दुधवा नेशनल पार्क का पर्यटन सत्र 15 नवंबर से शुरू होकर 14 जून तक चलता है। सत्र के शुरुआती दौर से ही सैलानियों की भीड़ उमड़ने लगती है। खासकर दिसंबर माह के अंत में और जनवरी माह में सैलानी यहां बड़ी संख्या में आते हैं। सैलानी नए साल का जश्न दीन दुनिया से दूर प्राकृतिक परिवेश में वन्यजीवों के बीच मनाकर अपने जीवन की यादगार मनाते हैं। वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक परिवेश में विचरण करते देख सैलानी रोमांचित हो उठते हैं। पर्यटन के लिहाज से दुधवा नेशनल पार्क सैलानियों के लिए सबसे बेहतर जगह साबित होता है।
वनवासी थारु महिलाओं को भी होता है लाभ
पलियाकलां। दुधवा नेशनल पार्क में आने वाले सैलानी अनूठी संस्कृति की पहचान रखने वाली थारु वनवासी महिलाओं के हस्तशिल्प कारीगरी से निर्मित वस्तुओं को खरीदकर अपने साथ ले जाना नहीं भूलते। दुधवा नेशनल पार्क के पर्यटन सत्र में यहां थारु उत्पादों के स्टाल भी लगाए जाते हैं। इससे थारु महिलाओं को भी काफी लाभ होता है। पार्क प्रशासन इनको स्वावलंबी बनाने के लिए रोजगार उपलब्ध कराता है। दुधवा पार्क में अधिकांश गाइड थारू ही हैं। इसके साथ ही सैलानी अनूठी थारु संस्कृति से भी रूबरू होते हैं, जो पर्यटन बढ़ाने में भी सहायक है। इनके उत्पादों में सबसे ज्यादा अगरबत्ती, मसाले, जूट से बने बैग, डलिया, टोपी, कैप, मोबाइल बैग, पर्स आदि सबसे चर्चित हैं जिन्हें खरीदने के लिए इनके स्टालों पर सैलानियों का तांता लगा रहता है।
इस बार जैव विविधता को दी जाएगी तरजीह
दुधवा में बाघ, गैंडा आदि जीवों के साथ ही उसकी जैव विविधता को विशेष रूप से तरजीह दी जाएगी। इसके लिए प्रशिक्षित गाइड सैलानियों को जैव विविधता के बारे में बताने के साथ उनका महत्व भी बताएंगे। विभिन्न वन्यजीवों की गतिविधियों को गाइड रोचक ढंग से पेश करेंगे ताकि सैलानियों को बाघ, गैंडा हिरन के साथ अन्य वन्यजीवों के दीदार में दिलचस्पी पैदा हो।
बफर जोन से भी हुई है दुधवा की सीमा में बढ़ोत्तरी
बाघों की लगातार घट रही संख्या के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बाघों के प्राकृतिक वास स्थल यानी कोर जोन में पहले से ही मानव की दखलंदाजी पर प्रतिबंध लगाया था, जिसके बाद सैलानियों के प्रवेश पर भी रोक लगा दी थी। अब बाघों के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए बफर जोन जंगल की सीमा को बढ़ाया गया। इसमें दुधवा टाइगर रिजर्व के जंगल की सीमा से सटे नार्थ खीरी फारेस्ट डिवीजन का 493 वर्ग किमी और साउथ खीरी फारेस्ट डिवीजन के 243 वर्ग किमी जंगल को बफर जोन घोषित कर दिया गया।
किशनपुर में टाइगर साइटिंग सबसे ज्यादा
दुधवा नेशनल पार्क के किशनपुर सेंक्चुरी में बाघों की साइटिंग सबसे ज्यादा होती है। यहां बारासिंघा आदि विभिन्न प्रजातियों के हिरनों की संख्या भी काफी है। इससे यहां बाघों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। किशनपुर से सटे बफर जोन के मैलानी और भीरा में भी बाघों की पर्याप्त संख्या है जिनकी टेरीटरी किशनपुर सेंक्चुरी तक है। दुधवा के जंगल से ज्यादा किशनपुर में अच्छी साइटिंग होने से सैलानी दुधवा की ओर रुख करते हैं।
गैंडा पुनर्वास परियोजना से पर्यटन को मिले नए आयाम
वर्ष 1977 में दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना के बाद करीब सवा दो सौ साल पहले यहां से लुप्त हुए गैंडों को उनके पुरखों की धरती पर फिर से पुनर्वासित करने ने लिए 1984 में दुधवा के दक्षिण सोनारीपुर रेंज में गैंडा पुनर्वासन योजना शुरू की गई। पहले चरण में आसाम से पांच गैंडे लाकर यहां रखे गए बाद में नेपाल से चार मादा गैंडे लाए। इसके बाद एक बार फिर से गैंडों की आबादी बढ़ने लगी। इसी साल अप्रैल माह में गैंडा पुर्नवास परियोजना फेज टू बेलरायां रेज में शुरू किया गया। यह गैंडा परियोजना सैलानियों में काफी लोकप्रिय हो चुकी है।
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इस बार भी देखने को मिल सकते हैं बदलाव
दुधवा नेशनल पार्क का नवीन पर्यटन सत्र 15 नवंबर से शुरू हो रहा है। इस बार नवीन पर्यटन सत्र को लेकर कुछ अलग बदलाव देखने को मिल सकते हैं। इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि भीरा डिपो में कर्नाटक से लाए गए हाथियों को भी इस नवीन पर्यटन सत्र में सैलानियों को भ्रमण कराने के लिए लगाया जा सकता है। हालांकि ऐसी केवल संभावनाएं ही जताई जा रही हैं पहलेेे इनत्न हाथियों को पेट्रोलिंग पर लगाने की योजना है।