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पढ़ाई करानी है तो सहन
करो स्कूलों की मनमानी
- कमीशन की खातिर ड्रेस से लेकर कोर्स खरीदने तक को दुकानें तय
- स्कूलों में ड्रेस जैसे खर्चों से टूट रही है अभिभावकों की कमर
अमर उजाला ब्यूरो
लखीमपुर खीरी।
यदि आपको अपने पाल्य को स्कूल भेजना है तो इन बेलगाम स्कूलों की साजिश का शिकार बनने को तैयार रहें। आपके बच्चों को क्वालिटी एजूकेशन देने का दावा करने वाले ये स्कूल असल में कमीशनखोरी के बड़े खेल की साजिश कर चुके हैं। नतीजतन स्कूल भेजने से पहले आपको इन स्कूलों के लिए धंधा करने वाले बुक सेलर्स की मनमानी के आगे चुपचाप होकर अपनी जेबें कटवानी ही पड़ेगी।
नया शैक्षिक सत्र शुरू होते ही स्कूल प्रबंधकों ने भी मनमानी शुरू कर दी है। खासकर अंग्रेजी माध्यम के स्कूल अभिभावकों को मनमाने ढंग से लूट रहे हैं। स्कूलों में रिपोर्ट कार्ड बंटने शुरू हो गए हैं। विद्यालय में रिपोर्ट कार्ड के साथ ही अभिभावकों को फीस के लिए बाउचर, कोर्स एवं ड्रेस खरीदने के लिए स्लिप पकड़ाई जा रही है। स्कूल प्रबंधकों ने अभिभावकों की जेब पर डाका डालने के लिए पूरी प्लानिंग कर रखी है। जितना बड़ा विद्यालय उसके उतने ही बड़े खर्चे। इनके संचालकों ने क्वालिटी शिक्षा देने के नाम पर भारी भरकम फीस निर्धारित कर दी है। इसी के साथ ही कुछ विद्यालय कॉलेज से ही कोर्स व ड्रेस अभिभावकों के हाथों बेच रहे हैं। प्रशासन कभी स्कूलों की मनमानी पर खुलकर नहीं बोलता। ऐसे में आपको अपने अधिकारों के लिए खुद ही लड़ना होगा।
कमीशन के चक्कर में
लगाते हैं महंगी बुक
अंग्रेजी हो या फिर हिंदी माध्यम के निजी विद्यालय सभी जगहों पर एनसीईआरटी की किताबें न लगाकर कमीशन के चक्कर में निजी प्रकाशकों की किताबें लगी हैं। कोर्स कहां बिकेगा यह भी विद्यालयों ने निर्धारित कर रखा है। कोर्स में ऐसी कोई भी किताब शामिल नहीं होती है जो सौ या डेढ़ रुपये से कम की हो।
हर एक्टिविटी की अलग यूनीफार्म
निजी विद्यालय कोर्स में मुनाफा वसूलने के साथ ही ड्रेस में भी धनउगाही कर रहे हैं। पहले जहां स्कूलों में एक ही ड्रेस लागू होती थी। वहीं आज हर एक्टिविटी की अलग-अलग ड्रेस लागू कर रखी है। अधिकतर विद्यालयों ने सप्ताह के पांच दिन एक जैसी और दो दिन एक जैसी ड्रेस निर्धारित कर रखी है। वहीं सांस्कृतिक कार्यक्रम में बच्चों को रखने पर उसके लिए ड्रेस अलग से खरीदवाते हैं।
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बच्चों का पढ़ाना
आसान नहीं रहा
बच्चों को पढ़ाना आसान नहीं रहा। स्कूलों में हर साल फीस बढ़ाने के साथ ही कोर्स भी बदल दिया जा रहा है। कोर्स चाहें नर्सरी क्लास का लो या फिर बड़े क्लासों का, किसी भी कोर्स की कीमत चार-पांच हजार से कम नहीं होती है।
- संगीता वर्मा, आवास विकास कॉलोनी
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मार्च में बढ़ जाती है टेंशन
मार्च आते ही बच्चों की फीस, एडमीशन, कोर्स आदि की खरीदारी को लेकर टेंशन बढ़ जाती है। क्योंकि मालूम ही नहीं हो पाता है कि विद्यालय वाले इस बार फीस में कितनी बढ़ोतरी करेंगे और कितने का कोर्स मिलेगा।
- लक्ष्मी पांडे, मोहल्ला हाथीपुर
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स्कूल करते हैं मनमानी
स्कूल मनमानी से बाज नहीं आते हैं। हर साल पंद्रह से बीस प्रतिशत तक फीस बढ़ा देते हैं और कमीशन के चक्कर में महंगा कोर्स भी लेने के लिए मजबूर करते हैं।
- वंदना उत्तम, बहादुर नगर
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अधिकारी भी रहते हैं खामोश
स्कूलों में कोर्स, ड्रेस एवं यूनीफार्म को लेकर जो खेल होता है, ऐसा नहीं है कि अधिकारी इससे अंजान हैं। जिला प्रशासन से लेकर बोर्ड अधिकारियों तक को स्कूलों के इस खेल की जानकारी होती है, लेकिन सभी मौन रहते हैं।
- दीपमाला, नई बस्ती