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दुधवा में परिंदों को निहारने का काम खत्म, तीन दिन बाद मिलेगी रिपोर्ट

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पलियाकलां। दुधवा नेशनल पार्क में प्रवासी पक्षियों की गणना के लिए तीन दिवसीय कार्य का समापन हो गया है। अंतिम दिन विशेषज्ञों ने लुप्तप्राय प्रजातियों को भी यहां के जंगलों में देखा। दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर रमेश कुमार पांडेय के मुताबिक पहली बार तीन अन्य प्रजाति मरून ऑरीओल, युरेशीयन स्पेरो हॉक और शार्ट ईयर्ड आउल नामक परिंदों के फोटोग्राफ लिए गए। चेक लिस्ट तैयार की जा रही है। उन्होंने बताया कि साथ ही गिद्धों की दो अन्य प्रजातियां भी यहां देखी गईं हैं। उन्होंने बताया कि इससे पहले वर्ष 2013 में पक्षियों के प्रजाति की गणना हुई थी, तब 450 प्रजातियां पाई गईं थीं।
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बता दें कि प्रवासी पक्षियों की गणना के लिए तीन दिवसीय बर्ड कांउटिंग का कार्य 14 सदस्यीय विशेषज्ञों के जरिए शुरू किया गया था। एफडी रमेश पांडेय और डीडी महावीर कौजलगि के नेतृत्व में यह विशेषज्ञ जंगलों के विभिन्न हिस्सों में जाकर पक्षियों का अवलोकन कर रहे थे। साथ ही उनकी प्रजातियों को भी नोट कर रहे थे। इस दौरान तीन दिनों में विभिन्न जगहों पर जाकर पक्षी विशेषज्ञों ने पक्षियों के आवासों, तालाबों और अन्य जगहों पर विचरण किया और उनको दूरबीन के जरिए देखा। इस गणना के जरिए दुधवा में लुप्तप्राय प्रजातियां देखी गई हैं। जिसमें हिमालयन ग्रिफॉन शामिल है, जिसको अच्छी संख्या में यहां देखा गया है। गिद्धों की दो अन्य प्रजातियां भी दिखी हैं। मॉलर्ड डक, ग्रीलाग गूज, गडवाल आदि प्रवासी पक्षियों को अच्छी संख्या में विशेषज्ञों ने देखा है। विशेषज्ञों के मुताबिक चेस्टनट जैसे प्रमुख पक्षियों में बब्बलर, स्वैम्प फ्रैंकोलिन, ग्रेट स्लैटी वुडपेकर भी यहां दिखे हैं। इन विशेषज्ञों में करतनिया घाट फांउडेशन, रूहेलखंड नेचर क्लब बरेली द्वारा प्रजातियों को संकलित किया गया है। टीम में अनिल सवाहने, जीवांश सवाहने, पिकेश श्रीवास्तव, असानी भादुड़ी, फर्जल रहमान, सुरेश चैधरी, रोहित शर्मा, जसविंदर सिंह, काजल दास गुप्ता आदि ने बर्डवाचिंग कौशल का योगदान देकर पक्षियों की प्रजातियों को नोट किया।

कहां की हैं ये नई प्रजातियां
1. मरून ऑरीओल: हिमालय पर्वत से लेकर इंडो-चाइना बार्डर पर रहने वाली पीले रंग की चिड़िया है।
2. युरेशीयन स्पैरो हॉक: यूरोप और एशिया के मध्य में पाई जाने वाली ये फैमिली बर्ड है। काले रंग की यह छोटी चिड़िया होती है, जो यहां पहली बार दिखी है।
3. शार्ट ईयर्ड आउल: हिमालय पर ठंड बढ़ने पर ये मैदानी इलाकों में आ जाते हैं। अभी तक ये राजस्थान के जंगलों में दिखता था। इसकी चोंच छोटी और रंग पीला भूरा होता है।
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दूरबीन के जरिए वॉच कर होती है गणना
फील्ड डायरेक्टर रमेश कुमार पांडेय और डीडी महावीर कौजलगि ने बताया कि पक्षियों की प्रजाति की गणना की जाती है। प्रजातियों की गणना के लिए परिंदो को दूरबीन से देखकर नोट किया जाता है। उन्होंने बताया कि भारत में पक्षी विज्ञान के जनक डॉ. सलीम अली की पुस्तक से बर्ड वॉचिंग का तरीका सीखना आसान होता है। पक्षी विशेषज्ञ भी इस पुस्तक का सहारा लेते हैं। साथ ही आठ बाई 40 और 10 बाई 50 रेंज की दूरबीन से पक्षी को देखते हैं। प्रजाति की गणना के लिए एक चेकलिस्ट तैयार की जाती है, जिस परिंदे की पहचान में कन्फ्यूजन की गुंजाइश होती है, उस पक्षी की चोंच, पक्षी का साइज और पंख का रंग व बनावट को नोट किया जाता है। यदि कैमरे में तस्वीर नहीं आ पाती तो उसका डायग्राम भी बना लिया जाता है। गणना पूरी होने के बाद चेकलिस्ट के साथ आंकलन के लिए उसे सौंपा जाता है।

450 प्रजाति से भी अधिक हो सकती हैं प्रजातियां
डीडी ने बताया कि दुधवा में 450 प्रजाति के पक्षियों के अलावा इस बार गणना में अन्य प्रजातियां भी देखने को मिली हैं। इससे यह कहा जा सकता है कि दुधवा में पक्षियों की प्रजातियों में इजाफा हुआ है और प्रवासी पक्षी भी इस बार ज्यादा दिखे हैं।

लगभग तीन दिन बाद मिलेगी रिपोर्ट
पक्षियों की इस गणना की रिपोर्ट लगभग तीन दिनों में मिलना बताया जा रहा है। डीडी ने बताया कि समय कम होने तथा गणना कार्य का समापन होने के कारण सभी विशेषज्ञ यहां से निकल चुके हैं लेकिन वह अपनी-अपनी रिपोर्ट लगभग तीन दिनों में पार्क प्रशासन को सौंपेंगे, जिसके बाद ही सही प्रजातियों का आंकलन किया जा सकेगा।
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