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जान जोखिम में डालकर वन सपंदा की रखवाली करते हैं वनकर्मी

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जान जोखिम में डालकर हो रही वन संपदा की रखवाली

बांकेगंज। लखीमपुर खीरी में जंगलों का विशाल क्षेत्रफल होने के बावजूद न तो पर्याप्त स्टाफ और न स्टाफ के पास संसाधन। इसके बावजूद वनाधिकारी और वनकर्मी जान जोखिम में डालकर वन संपदा की रखवाली करते हैं। स्टाफ का आलम यह है कि एक रेंजर को दो रेंजों का काम संभालना पड़ रहा है।। फारेस्टर और फारेस्ट गार्ड को एक साथ र्कई बीटों की रखवाली करनी पड़ रही है। शस्त्रों के नाम पर उनके पास पुरानी बंदूक और रायफल हैं, जो मौके पर फायर कर पाएंगी इसमें भी संदेह रहता है।
दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन की मैलानी और भीरा रेंज के अलावा दुधवा नेशनल पार्क के किशनपुर सेंक्चुरी में कोरजोन एरिया के आसपास बसे गांव के लोग पूरे साल जंगल में घुसपैठ करते हैं। सर्दियों में जलौनी लकड़ी, गर्मियों में घर बनाने के लिए थुनिया-थंबर, घास-फूस और बरसात में कटरुआ, धरती के फूल बीनने के लिए दस बीस नहीं सैकड़ों लोग एक साथ जंगल में घुसपैठ कर प्राकृतिक संपदा का दोहन करते हैं। मौका मिलने पर वह कुड़का या खाबड़ लगाकर जंगली जानवरों का शिकार भी कर लेते हैं।
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जंगल पर मंडराते खतरों से निपटने के लिए वनकर्मी अपनी जान जोखिम में डालते हैं। मैलानी रेंज की जटपुरा और महुरेना बीट में तैनात वन रक्षक सुखपाल सिंह जंगलों की रक्षा करते हुए अपनी जान गवां दिए। माना जा रहा है कि जंगल में अवैध कटान पर अंकुश लगाने पर लकड़कट्टों ने उनकी गश्त के दौरान हत्या कर दी। किशनपुर सेंक्चुरी के चलतुआ जंगल में बाघिन को बचाने के प्रयास में गांव वालों ने कांबिग कर रहे हाथी के महावतों और चाराकटरों की पिटाई की। दक्षिण खीरी वन प्रभाग के महेशपुर रेंज में बाघ हमले से गुस्साए ग्रामीणों ने वन कर्मियों पर हमला कर दिया। रेंज कार्यालय में तोड़फोड़ करने के बाद वहां आग लगा दी। वन कर्मियों के आवासों पर भी लूटपाट और आगजनी की। यही नहीं महेशपुर रेंज में ग्रामीणों ने पांच वन कर्मियों को पीट कर घायल कर दिया। इसके अलावा वन भूमि पर अतिक्रमण हटाने के दौरान भी कई बार वन कर्मियों को चोट खानी पड़ी। इन घटनाओं से वन कर्मियों का मनोबल गिर रहा है।
हाल ही में हाईकोर्ट ने दुधवा टाइगर रिजर्व में अवैध घुसपैठ को संज्ञान में लेकर बीएसएफ तैनात करने की बात कही है, जबकि वन कर्मियों का कहना है कि यदि वन विभाग के पास आवश्यकता अनुसार पर्याप्त स्टाफ हो और उन्हें आधुनिक साधन मुहैया कराए जाए तो अकेले वन विभाग का स्टाफ ही जंगलों की सुरक्षा करने में सक्षम हैं। बाहरी फोर्स तैनात होने से जंगल का प्राकृतिक वातावरण विकृत होगा। जंगल में भारी चहलकदमी से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में भी खलल पड़ेगा। ऐसे में वन विभाग के फील्ड स्टाफ को मजबूत करने की जरूरत है।


वर्जन......
जंगलों की सुरक्षा के लिए न पर्याप्त स्टाफ है और न ही आधुनिक संसाधन। इसके बावजूद वनकर्मी जान जोखिम में डालकर जंगलों की सुरक्षा में लगे हैं। जंगल में पर्याप्त फील्ड स्टाफ की तैनाती और उन्हें आधुनिक संसाधनों से लैस कर दिया जाए तो वन संपदा की सुरक्षा आसान होगी।
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- राम प्रसाद, पूर्व अध्यक्ष उत्तर प्रदेश वन रक्षक संघ, लखनऊ।


वर्ष 1977 में दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना के समय वन कर्मियों के जो पद स्वीकृत हुए थे वही वनकर्मी जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा का कार्य कर रहे हैं। इसमें कई वन कर्मी रिटायर हो गए। जबकि जंगल के बाहरी किनारों पर बसे गांवों में आबादी बढ़ने से लोगों की जंगलों पर निर्भरता बढ़ती चली गई। जिससे परोक्ष रूप से जंगलों पर दबाव बढ़ता गया। कतिपय कारणों से फील्ड स्टाफ में बढ़ोत्तरी नहीं हो सकी। फिर भी उपलब्ध संसाधनों और स्टाफ के जरिए वन विभाग जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा पूरी मुस्तैदी से कर रहा है।
-डॉ. अनिल कुमार पटेल, उप-निदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्व, बफरजोन।
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