हिमालय की तलहटी में स्थित तराई क्षेत्र शिव और शक्ति की उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है। यही कारण है कि यहां प्राचीन शिव और देवी मंदिरों की बहुतायत है। शहर के बीच स्थित मां संकटा देवी का प्राचीन मंदिर न केवल लखीमपुर खीरी जिले बल्कि आस पास के जिलों के लाखों लोगों की गहन आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने महाभारत युद्ध के बाद भगवान पशुपति नाथ मंदिर से लौटते समय यहां मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित की थी। पूरे नवरात्र यहां मेला लगता है और भक्तों की भारी भीड़ रहती है।
मां संकटा देवी की पूजा मां महालक्ष्मी के रूप में होती है। मां लक्ष्मी के नाम पर ही इस शहर का नाम लक्ष्मीपुर पड़ा जो बाद में लखीमपुर हो गया। संकटादेवी मंदिर जहां स्थित है उस मोहल्ले का नाम भी संकटादेवी है। लोगों की इस प्राचीन देवी प्रतिमा में गहन आस्था है। मान्यता है कि मां संकटादेवी की उपासना करने से सभी संकट दूर होते हैं और जीवन में सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है।
लोक मान्यता है कि संकटादेवी की यह प्राचीन प्रतिमा भगवान श्रीकृष्ण ने स्थापित की थी। महाभारत युद्ध के बाद पांडव भगवान कृष्ण और रुकमणि के साथ पशुपतिनाथ दर्शन को जाते समय इसी रास्ते से होकर गुजरे थे। प्राचीन काल में यह क्षेत्र नैमिषारण्य क्षेत्र में आता था। यहां का वन क्षेत्र इतना रमणीक था कि रुकमणि ने यहीं पर कुछ समय बिताने की इच्छा जताई, तब भगवान कृष्ण ने यहां पर महालक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित की। इसकी पांडवों के साथ भगवान कृष्ण ने भी विधिवत पूजा अर्चना की और उसके बाद आगे की यात्रा पर रवाना हुए। हालांकि इसका कोई पौराणिक उल्लेख शास्त्रों में नहीं मिलता है।
हजारों साल बाद जब यहां आबादी होने लगी और जंगल कटे तो यह प्राचीन प्रतिमा प्रकट हुई। तत्कालीन महेवा स्टेट के शासकों ने दिव्य देवी प्रतिमा पाकर इसी स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया। प्राचीन संकटादेवी की प्रतिमा भूरे रंग के पत्थर की है। इस पर चांदी का कवच पहना कर मूर्ति को सुंदर आकृति प्रदान की गई है। मूर्ति मंदिर के गर्भगृह के अंदर सिंहासन पर विराजमान है। मंदिर का मुख्य द्वार पूरब की ओर है। दक्षिण दिशा में भी एक विशाल द्वार सुविधा के लिए बनाया गया है। मुख्य मंदिर के सामने विशाल बरामदा है, जिसमें यज्ञस्थल निर्मित है। मंदिर के चारों ओर छायादार प्रदक्षिणा पथ है। मंदिर विशाल प्रांगण में है। मंदिर परिसर में शिव, हनुमान मंदिर भी हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर के दाईं ओर भव्य देवी प्रतिमा स्थापित होती है, जहां रोज रात को जागरण और दिन में देवी भागवत कथा होती है। यहां शारदीय और बासंतिक नवरात्र के अलावा आषाढ़ मास में गुप्त नवरात्र पर भी मेला लगता है। कभी यहां देवी को पशु बलि देने की प्रथा थी, जो बाद में धीरे-धीरे समाप्त हो गई। मंदिर आज भी महेवा स्टेट के स्वामित्व में है, लेकिन मंदिर की व्यवस्था मां संकटादेवी आरती समिति और दूसरी संस्थाएं संभालती हैं। यूं तो यहां दर्शनार्थियों की पूरे साल भीड़ भाड़ रहती है। लोग बच्चों के मुंडन और अन्नप्रासन संस्कार कराते हैं। नवरात्र में यहां शहर के अलावा पूरे जिले और दूसरे जिले से श्रद्धालु आकर पूजा अर्चना करते हैं और मनौतियां मानते हैं।