लखीमपुर खीरी/ईसानगर/धौरहरा।
अवध की सांस्कृतिक विरासत के रूप में पहचान रखने वाला कार्तिक पूर्णिमा का चार सौ साल पुराना ठुठवा मेला कभी तत्कालीन जांगड़ा राजाओं का आम जनता से मिलने का माध्यम था, जो राजशाही खत्म होने के बाद अब यहां के जनप्रतिनिधियों के जनसंपर्क का जरिया है। यह मेला कभी घर परिवार के लिए उपयोगी वस्तुओं की खरीद फरोख्त और अध्यात्मिक साधना के साथ ग्रामीणों के मनोरंजन का भी साधन था। यह मेला करीब एक सप्ताह तक चलता है।
राजा रंजीत सिंह ने 400 साल पहले शुरू कराया था मेला
ईसानगर राजपरिवार के वंशज समर प्रताप सिंह बताते हैं कि करीब 400 साल पहले वर्ष 1605 में ईसानगर स्टेट के तत्कालीन जांगड़ा राजा रंजीत सिंह ने इस मेले की शुरुआत कराई थी। उपलब्ध इतिहास के अनुसार दशहरे पर शस्त्र पूजन करने के बाद राजपरिवार शिकार के लिए जंगलों में निकल जाता था। दिवाली के मौके पर वे लौटते और दिवाली के बाद जनता से मिलने के लिए घाघरा नदी के किनारे शिविर लगाकर लोगों से मुलाकात करते थे। इस दौरान वहां मेला सा लग जाता था। राजपरिवार और प्रजा के मनोरंजन के लिए दंगल और खेल तमाशे, नृत्य और संगीत के कार्यक्रमों के साथ धार्मिक अनुष्ठान भी होते थे। ठुठवा गांव के निकट लगने के कारण यह मेला ठुठवा मेला के नाम से मशहूर हुआ। राजा रंजीत सिंह के बाद उनके वंशजों राजा भुवनेश्वरी प्रताप सिंह, राजा राजेंद्र सिंह, राजा इंद्र बहादुर सिंह, राजा रघुराज प्रताप सिंह आदि ने इस मेले को बुलंदियां दीं। यह भी कहा जाता है कि अपनी स्टेट को घाघरा के प्रकोप से बचाने के लिए राजा रंजीत सिंह ने देवोत्थानी एकादशी के दिन घाघरा को प्रसन्न करने के लिए पूजा अर्चना और अनुष्ठान किए थे। तभी से यहां देवोत्थानी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक मेला लगने लगा।
अब जनप्रतिनिधि यहां लगाते हैं अपने शिविर
आम जनता से जनसंपर्क से उद्देश्य से शुरू हुआ यह मेला राजशाही खत्म होने के बाद लोकतंत्र के जनप्रतिनिधियों के जनसंपर्क का माध्यम बन गया। अब राजपरिवार के साथ-साथ क्षेत्र के मौजूदा और पूर्व सांसद, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधि मेले में अपने शिविर लगाकर लोगों से मुलाकात करते हैं।
साधू-संत और श्रद्धालु यहां करते हैं कल्पवास
ठुठवा मेले में श्रद्धालु और साधू-संत देवोत्थानी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक नदी किनारे कल्पवास करते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। कन्याएं और महिलाएं नदी किनारे महीने भर गाय के गोबर से गौरजा बनाकर मां गौरी की पूजा करती हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन उसे घाघरा में प्रवाहित कर अनुष्ठान पूरा करती हैं।
हलवाई करते हैं मेला स्थल का चयन
सदियों से यह परंपरा चली आ रही है कि मेला स्थल का चयन हलवाई करते हैं। उनके बताए स्थान पर ही मेला लगता है। पहले मेले की व्यवस्था राज परिवार करता था, अब व्यवस्था की जिम्मेदारी जिला प्रशासन ने ले ली है। मेले के दौरान प्रशासन सुरक्षा समेत पूरी व्यवस्था को चाक चौबंद रखता है। यहां पुलिस चौकी भी स्थापित होती है।
घाघरा किनारे बनी थी राजा
रघुराज सिंह की समाधि
ईसानगर स्टेट की तीसरे पीढ़ी के राजा रघुराज प्रताप सिंह नियमित नदी पर स्नान करने जाते थे। उनकी अंतिम इच्छा के चलते राजा की मृत्यु के बाद उनकी समाधि घाघरा किनारे बनाई गई। घाघरा नदी ही यहां सरजू नदी के नाम से जानी जाती है। वहीं सैनिकों की एक टुकड़ी बसा दी गई। उस गांव का नाम राजापुर पडा जो रामलोक का मजरा गांव है। नदी ने कटान करते हुए 1990 में राजापुर गांव के साथ राजा रघुराज प्रताप की समाधि को भी अपने अंक में समेट लिया।