लखीमपुर खीरी/बांकेगंज।
दुधवा बफरजोन की मैलानी रेंज जंगल से सटे करीब तीन दर्जन गांवों में दो साल के अंदर बाघ के हमलों में नौ से अधिक परिवार तबाह हो चुके हैं। पति के मरने से पत्नी की मांग उजड़ी तो बहन छिनने से किसी भाई की कलाई सूनी रह गई। बच्चों के सिर से पिता की छाया छिना तो कई माता-पिता के आंखों के तारे बाघों का निवाला बने। बाघों ने यहां के लोगों को बहुत दर्द दिए हैं। जंगल के किनारे बसना इन ग्रामीणों के लिए अभिशाप बन गया है। आलम यह है कि लोग न तो ढंग से खेतीबाड़ी कर पा रहे हैं, न बच्चे स्कूल में पढ़ाई ही कर पाते हैं। जंगल से सटे सारे परिवार दहशत में जीने को विवश हैं।
बांकेगंज कस्बा से सटे गांव सोहनरा भूड़ निवासी नरेंद्र कौर के पति तरसेम सिंह उर्फ पप्पू 16 मार्च 2016 को जंगल से सटे खेत में गेंहू की फसल की रखवाली कर रहा था, जहां बाघ ने उसे निवाला बना लिया। घटना के 20 माह बीत गए, लेकिन नरेंद्र कौर आज भी इस घटना को भुला नहीं पाई हैं। इसी तरह मैलानी रेंज की जटपुरा बीट के गांव ढाका निवासी गायत्री और राजकिशोर की 19 साल की बेटी किरन गांव किनारे गेंहू फसल की कटाई कर रही थी, किरन को भी बाघ ने अपना निवाला बनाया। यह घटना 15 अप्रैल 2016 को हुई। इसके अलावा इसी रेंज के गांव कपरहाकुंआ निवासी मां सुमेरी देवी और पिता हिंछपाल की 15 साल की पुत्री भी जंगल से सटे खेतों में काम करने गई थी,सरस्वती को भी बाघ ने अपना निवाला बना लिया। यह घटना 15 अगस्त 2016 को हुई। जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, तब हिंछपाल और सुमेरी देवी के घर में गम का पहाड़ टूटा था। उसकी मां इस हादसे को अभी तक नहीं भुला पाई है।
इससे पहले इसी रेंज में 16 फरवरी 2016 को बांकेगंज कस्बे से सटी कुकरा-भीरा रोड से गुजर रहे कुकरा निवासी रईस अहमद, सात जुलाई को खरेहटा निवासी भोगन, 19 अगस्त को छेदीपुर के टीकाराम सहित नौ लोगों को बाघ ने हमला कर मार डाला था। बाघ हमलों में हुई मौतों के बाद मृतकों की पत्नि सलीमा बेगम, नरेंद्र कौर, उर्मिला देवी,जया देवी आदि की गृहस्थी उजड़ गई। परिवारवालों के चेहरे पर बाघ के हमलों का खौफ दिखता है। वन विभाग बाघ के हमलों में हुईं मौतों के बाद मृतक आश्रितों के परिवारों को मुआवजा देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है। वन विभाग न तो जंगल से सटे गांवों में बाघ के हमले में घायल होने वाले और जान गंवाने वाले बेकसूर ग्रामीणों की परवाह कर रहा है और न ही बाघ हमलों को रोकने के कोई ठोस कदम उठाए गए।
अब तो तात्कालिक सहायता मिलने में भी लग जाते है महीनों...
बाघ हमलों में मौत हो जाने पर डब्ल्यूडब्ल्यूएफ मृतक के आश्रित को 10 हजार और घायल होने पर पांच हजार की तात्कालिक आर्थिक सहायता उपलब्ध करा देता था। नोटबंदी के बाद से विभाग ने यह प्रक्रिया बदल दी गई है। बाघ हमले में मरने या घायल होने की स्थिति में संबधित रेंज के रेंजर की रिपोर्ट मिलने के बाद यह प्रकिया शुरू होती है। प्रक्रिया में महीनों लग जाते हैं। इस दौरान जंगल के किनारे बसे गरीब परिवारों को मृतकों के क्रियाकर्म और घायलों के इलाज में दिक्कतें आती हैं।
ग्रामीणों पर बाघ हमले की होने वाली घटनाओं को रोकने के लिए वन विभाग हर संभव प्रयास कर रहा है। ग्रामीणों से अपील है कि वे जंगल के अंदर न जाएं। गन्ने खेतों में समूह के साथ और शोर मचाते हुए जाएं।
- डॉ. अनिल पटेल, डीएफओ और डीडी,बफरजोन, दुधवा टाइगर रिजर्व।
बाघ हमलों में मारे गए और घायल होने वाले लोगो को दी जाने वाली तात्कालिक आर्थिक सहायता के लिए विभाग के पास बजट नहीं है। बजट आते ही बाघ हमलों में मारे गए और घायलों को संबधित रेंजर की रिपोर्ट के बाद प्रक्रिया शुरू होती है। इसके बाद आर्थिक सहायता की धनराशि आश्रितों को चेक से दी जाएगी।
- दबीर हसन, परियोजना अधिकारी, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ, खीरी