लखीमपुर खीरी। स्वास्थ्य विभाग ने जच्चा बच्चा को सुरक्षित रखने के लिए कई योजनाएं संचालित कर रखी हैं। जिन पर लाखों का बजट भी खर्च हो रहा है, लेकिन उसके बावजूद जिले में स्टिल बर्थ के केस सामने आ रहे हैं। जिला महिला अस्पताल के आंकड़ों पर यदि गौर किया जायए तो वहां पर हर माह करीब पांच से छह नवजात की मौत हो रही है।
जच्चा बच्चा को सेहतमंद बनाने के लिए जननी सुरक्षा योजना, मातृ एवं शिशु सुरक्षा योजना सहित आंगनबाड़ी कार्यक्रम चलाया जा रहा है, लेकिन इन सबके बावजूद हर माह करीब पांच छह बच्चों की हो रही मौत चौंकाने वाली है। जिला महिला अस्पताल से मिले आंकड़ों के अनुसार सितंबर माह तक प्रसव के दौरान गर्भ में 32 नवजात की मौत हो चुकी है। शासन की कई योजनाओं और उनके लिए दी जाने वाली भारी भरकम धनराशि के बाद भी बच्चों की हो रही मौतें योजनाओं और उनकी निगरानी करने वाली अधिकारियों पर कई सवाल खड़े कर रही हैं।
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ये है स्टिल बर्थ
स्टिल बर्थ में नवजात की गर्भ में ही मौत हो जाती है। मां के साथ साथ गर्भ में पल रहे नवजात को भी आहार की जरूरत होती है, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि मां को ही पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता है, जिससे नवजात को भी जरूरी खुराक नहीं मिल पाती है और वह दम तोड़ देता है। वहीं कई नवजात की मौत उसके गले में नाल फंसने के कारण भी हो जाती है।
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बाल रोग विशेषज्ञ की राय
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ.आईबी त्रिपाठी का कहना है स्टिल बर्थ के कारण कई हो सकते हैं। गर्भस्थ शिशु का सीधा कनेक्शन मां से होता है। गर्भवती का जैसा खान पान होगा वैसी ही नवजात की सेहत होगी। नवजात की देखरख के लिए तीन बार अल्ट्रासाउंड होना चाहिए। पहला गर्भधारण के तीन माह बाद, दूसरा छह माह और तीसरा डिलीवरी से पहले, जिससे नवजात की सेहत और उसकी स्थित का पता लग सके।
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सीएमएस का नजरिया
महिला अस्पताल की सीएमएस और सर्जन डॉ.मीरा वर्मा का कहना है स्टिल बर्थ का मुख्य कारण गर्भवती में आयरन और फॉलिक एसिड की कमी, प्रेग्नेन्सी के दौरान संक्रमण, समय से पहले अधिक ब्लीडिंग होना, नवजात की दिल की धड़कना कम हो जाना या फिर नवजात के गले में नाल का फंस जाना है। उन्होंने बताया कि गर्भवती की समय-समय पर जांच और संपूर्ण टीकाकरण कराने और उसकी उचित देखभाल तथा खान पान पर विशेष ध्यान देकर स्टिल बर्थ को रोका जा सकता है।